परम्परागत कृषि विकास योजना : कृषि विभाग के अफसर डकार गये 500 करोड़, और सरकार सोती रही

परम्परागत कृषि विकास योजना : कृषि विभाग के अफसर डकार गये 500 करोड़, और सरकार सोती रही
  • सेसबनिया का नाम बदलकर अफसरों ने कर दिया सेसबनिया रौस्ट्रेटा
  • केंद्र की पूरी योजना ही बदल दी कृषि विभाग के अफसरों ने
  • कृषि मंत्री को नहीं लगी कोई भनक
  • 4100 करोड़ की थी योजना

Bhopal Desk, Gautam Kumar :- मध्य प्रदेश में वर्ष 2015 से 2019 तक ट्रेडिशनल खेती के नाम पर 500 करोड़ रूपये के घपले का मामला सामने आया है। एक स्थानीय अखबार की माने तो इस घपले में सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार कृषि विभाग के अफसरों को माना गया है।

केंद्र सरकार ने तकरीबन 5 साल पहले यानी की वर्ष 2015 में ट्रेडिशनल खेती को बढ़ावा देने के लिए एक योजना लागू किया था। इसका नाम रखा गया था परंपरागत कृषि विकास योजना। इस योजना के तहत केंद्र सरकार के तरफ से हर राज्य के किसानो को सेसबनिया बीज लगाने के लिए कुछ अनुदान देती थी। सेसबनिया बीज की किसानी के लिए इस योजना में प्रति हेक्टेयर किसानो को 12 हज़ार रूपये देने का प्रावधान था। लेकिन कृषि विभाग के अफसरों ने बीज का नाम ही बदल दिया उसका नाम कर दिया गया सेस्बनिया रोस्ट्राटे जो की है तो इसी पौधे का एक प्रकार लेकिन भारत में इसकी पैदावार है ही नहीं। आउट तो और इसकी भनक तक प्रदेश सरकार को नहीं लगी या तो उन्होंने ऐसा होने दिया। किसानो को सेस्बनिया की जगह भारत की ही सेस्बनिया रोस्ट्रेट  का एक सबसे दोयम दर्जे का घास ढेंचा बाँट दिया गया जिससे इनके समय का भी नुकसान हुआ और ज़मीनो का भी।

क्या होता है सेसबनिया
सेसबनिया एक फूल का पौधा होता है जिसके फूल सफ़ेद और लाल भी होते हैं। लेकिन सफ़ेद फूल में कई सारे औषधिय गुण होते हैं और इसका इस्तेमाल पेट से जुडी बीमारियों में किया जाता है। जबकि सेसबनिया रोस्ट्रेटा एक विदेशी पौधा है और इसकी कीमत भारतीय बाज़ारों में काफी ज्यादा है। यह बीज करीब सवा सौ रूपये किलो आता है और जो ढेंचा बीज किसानो को बाँटा गया उसकी कीमत मात्रा 25 रूपये किलो है जिसका इस्तेमाल खेत की उर्वरकता को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका और कोई भी इस्तेमाल नहीं होता।

 

 

किसानो के साथ केंद्र को भी धोखा दिया
कृषि विभाग के अफसरों ने इस खेल को पुरे सिद्धत से खेला है पहले तो उन्होंने केंद्र के आदेश को ही बदल दिया। जिस बीज का नाम सेसवानिया था उसको सेसबनिया रोष्ट्रेटा कर दिया गया। और किसानो को बाँट दिया गया दोयम दर्ज़े का ढेंचा। ये घोटाला तकरीबन 500 करोड़ का बताया जा रहा है और अगर किसी के नज़र में नहीं आता तो यह घोटाला करीब 4100 करोड़ का हो सकता था। अफसरों ने इतना किया लेकिन उस समय की सरकार को इसकी भनक कैसे नहीं लगी या तो शिवराज सिंह के समय कृषि मंत्री रहे गौरी बिशेन को अपने अफसरों और केंद्र की इस योजना की भनक ही नहीं थी या तो वे जानना नहीं चाहते थे। अफसरशाही को नकारने वाले शिवराज सिंह के कार्यकाल के दौरान तकरीबन साढ़े तीन सालों तक यह घोटाला चलता रहा और किसी भी नेता को इसकी भनक नहीं लगी। अफसर के साथ दलालों ने भी किसानो के हक़ का पैसा अपनी जेबों में भरा और पूरा मन्त्रालय चिर निंद्रा में सोता रहा। हो सकता जांच आगे बढ़ने के बाद नेताओं के भी नाम आएं पर अभी तक ऐसी कोई पुष्टि नहीं की गई है।
इस योजना के तहत इसकी लागत का 60 फीसदी हिस्सा केंद्र की तरफ से आना था जबकि बाकी का 40 प्रतिशत राज्य के ख़जाने से जाता। मतलब अफसरों ने केडंरा को तो चूना लगाया ही साथ-साथ राज्य को भी धोखे में रखा गया।

रातो रात खड़ी कर दी कम्पनी
अच्छा जिस कंपनी को इन बीजों के खरीदी का टेंडर दिया गया वह कंपनी भी सिर्फ कागज़ों पर ही काम करती है। इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर ने इस बात की पुष्टि की है कि इस नाम की कोई कंपनी है ही नहीं। यह कृषि से जुड़ा एक दाना भी पैदा नहीं करती है और यह एक फ़र्ज़ी कंपनी है। अभी तक कंपनी के मालिक का नाम सामने नहीं आया है। मतलब की कंपनी भी अपनी बीज भी अपना और घोटाला भी अपना। इस पुरे घोटाले में करीब 538 करोड़ रूपये का फर्जीवाड़ा हुआ है सारा पैसा अधिकारियों ने और दलालों ने अपनी जेबों में भरा और पहले से ही मरते हुए किसानों को और भी बदहाल स्थिति में ला दिया।

4100 करोड़ का होता घोटाला
अगर इस घोटाले का राज़ सामने नहीं आता तो सभी अधिकारी खुद मंत्री बनने के फ़िराक में बैंठे थे क्यूंकि इतने बड़े घोटालें तो हमने ज्यादातर मंत्रियों के हिस्से ही देखा है। अगर इस घोटाले को यही नहीं रोका जाता तो तय समय-सिमा के दौरान यह घोटाला तकरीबन 4100 करोड़ का हो सकता था। यानी की किसानो की किस्मत और हक को इन अधिकारियों के जूते तले रौंद दिया जाता।

राजीव गाँधी का कहना था कि केंद्र से 10 रूपये चलते हैं तो आम आदमी तक पहुँचते-पहुँचते वह 1 रूपये में तब्दील हो जाता है। यह एक रूपये में कैसे तब्दील होता है इस घोटाले से आप समझ सकते हैं। पढ़े-लिखे लोग ही किसानो का ज्यादा शोषण कर रहे हैं और इनके ऊपर बैठे नेताओं को इसकी खबर न हो यह बात थोड़ी हज़म नहीं होती। पूरा फण्ड आया बांटा गया खाया गया और मंत्रीजी सोते रहे हो ऐस तो भारत देश में काम ही देखने को मिला है। बहरहाल अभी कांग्रेस का लगता है इस बार का कार्यकाल घोटाले ढूंढने में ही निकल जाएगा क्यूंकि एक घोटाला तो ढूंढने में उन्हें डेढ़ साल लग गए। और शिवराज सरकार को तो ये घोटालों की सरकार पहले ही बता चुकें हैं। फ़िलहाल तो वर्तमान कृषि मंत्री ने इस बारे में कहा है कि इसकी सख्त जांच करवाई जायेगी और इसमें शामिल सभी अधिकारियों और दलालों पर सख्त करवाई की जायेगी।