MP : रेमडेसिवर इंजेक्शन की हो रहीं कालाबाज़ारी, एक डोज़ के 20 हज़ार तक वसूले जा रहे, Corona से निपटने के लिए है कारगर, पढ़े विशेष रिपोर्ट

MP : रेमडेसिवर इंजेक्शन की हो रहीं कालाबाज़ारी, एक डोज़ के 20 हज़ार तक वसूले जा रहे, Corona से निपटने के लिए है कारगर, पढ़े विशेष रिपोर्ट

मध्यप्रदेश/भोपाल - देश सहित मध्यप्रदेश में कोरोना का कहर तेज़ी के साथ फेल रहा हैं। बीते 24 घंटे के भीतर जहां देश में 1 लाख से ज़्यादा मामले सामने आए है तो वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में भी कोरोना के रिकॉर्ड तोड़ मामले सामने आए हैं। बीते 24 घंटे के अंदर मप्र में 3700 से ज़्यादा नए मामले सामने आए हैं। जिसने शासन प्रशासन की चिंता को बढ़ा दिया हैं। मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कोरोना वायरस की दूसरी लहर को लेकर लगातार जन जागरूकता अभियान चला रहे हैं। साथ ही इसकी रोकथाम के लिए कई कदम भी उठाएं भी गए हैं, बावजूद इसके संक्रमण थमने का नाम नहीं ले रहा हैं। 

बता दे कि कोरोना को नियंत्रण और लोगों को इस से बचाने के लिए वैक्सीनेशन का काम भी ज़ोरो पर चल रहा हैं। लेकिन अभी भी कई प्रदेश के जिले ऐसे है जहां कोरोना की वैक्सीन नहीं पहुंची है, यदि पहुंची भी है तो यहां इसकी लुटा मारी ज़्यादा हैं। लेकिन इन सबके बीच अब कोरोना के इलाज के लिए बेहद जरूरी रेमडेसिवर इंजेक्शन की कालाबाजारी की चिंताजनक खबरें सामने आ रहीं हैं। 
 
जानते है क्या है रेमडेसीवर इंजेक्शन

रेमडेसीवर इंजेक्शन की बात है तो कोविड के इलाज में अब तक यही सबसे कारगर दवा मानी जा रही हैं। दरअसल, मई 2020 में अमेरिका की जीलेड कंपनी ने पहली बार रेमडेसिवर दवा तैयार की, जो इंजेक्शन के जरिए दी जानी थी। बाजार में यह वेक्लूरी के नाम से बिकती हैं। रेमडेसिवर मूलत: सार्स कोविड 2 के इलाज के लिए विकसित की गई थी। लेकिन बाद में इसे कोविड 19 के इलाज में भी कारगर पाया गया। डब्लूएचओ की गाइड लाइन के मुताबिक बनी इस दवा को पहले डब्लूएचओ ने मंजूरी दी। भारत में पिछले साल जून में एफडीए ( खाद्य एवं औषधि प्रशासन) की स्वीकृति‍ मिली।

बता दे कि रेमडेसिवर पर दुनिया के कई देशों में क्लीनिकल ट्रायल हुए जिनमें पाया गया कि इस दवा के इस्तेमाल से रोगियों के ठीक होने का समय 15 दिन से घटकर 11 दिन हो जाता हैं। 

गंभीर मरीजों को दिए जा रहे 6-7 डोज

कोरोना के गंभीर मरीजों को रेमडेसिविर के 6-7 डोज दिए जा रहे हैं। ऐसे में मरीजों के 30 से 40 हजार रुपए इस दवा की डोज में ही खत्म हो जा रहे हैं। इसके बावजूद सरकार अब तक इसकी सप्लाई सुनिश्चित नहीं करा पा रही। खबरों की मानें तो राजधानी भोपाल, के अलावा बड़े शहर इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर सहित कई जिलों में इस इंजेक्शन की कमी हैं। जिसे सरकार को पूरा करने की ज़रूरत हैं। 

प्रतिदिन 10 हजार से अधिक रेमडेसिवर इंजेक्शन की मांग, सप्लाई सिर्फ इतनी 

ऑल इंडिया ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ ड्रगिस्ट एंड केमिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि मध्यप्रदेश जैसे कोरोनाग्रस्त राज्यों में रेमडेसिवर शीशियों की मांग प्रतिदिन 10 हजार से अधिक हो गई है, जबकि सप्लाई 5 से 6 हजार शीशियों की ही हो पा रही हैं। कंपनियों ने मांग को देखते हुए उत्पादन बढ़ा दिया है, लेकिन मांग और आपूर्ति में संतुलन बनने में समय लगेगा। दूसरा अहम मुद्दा रेमडेसिवर की कीमत का हैं। मीडिया में कई रिपोर्टे हैं, जिसके मुताबिक रेमडेसिवर के कई जगह मनमाने रेट वसूले जा रहे हैं।

जमकर हो रही कालाबाज़ारी 

जाइलस केडिला कंपनी ने स्पष्ट किया है कि उसके रेमडेसिवर इंजेक्शन की कीमत मात्र 899 रू. हैं। कुछ दूसरी कंपनियों ने भी दाम घटाए हैं, लेकिन जरूरतमंदों तक इसका फायदा पहुंच रहा है या नहीं, यह देखने वाला कोई नहीं हैं। इस से पहले बीते बरस जब अगस्त में कोरोना की पहली लहर चरम पर थी, तब भी रेमडेसिवर का टोटा पड़ गया था और उसकी कालाबाजारी शुरू हो गई थी। हालांकि ये दवा निर्माता कंपनियां भी रेमडेसिविर इंजेक्शन 4000 से 5500 रू. में बेच रही थीं। तब सिप्ला ने इस इंजेक्शन की कीमत 2800 रू. तय की थी, लेकिन बाजार में यह 6 गुना ज्यादा दाम पर बेचा जा रहा था। हाल अभी भी वोही हैं। कई मरीज़ो का कहना है कि दुकानदार इस इंजेक्शन की कालाबाजरी कर रहे हैं। इस इंजेक्शन के 10 से 12 हज़ार रुपए तक मांगे जा रहे हैं। जबकि जिसको इसकी ज़्यादा ज़रूरत है उससे 20 हज़ार रुपए तक वसूले जा रहे हैं। रोगी और उसके परिजनों की मजबूरी यह है कि उन्हें मुंहमांगे दाम पर उसे खरीदना पड़ रहा है, क्योंकि किसी तरह पेशंट की जान बचानी  हैं। 

सरकार तय करें इसका दाम 

राज्य सरकार ने कोविड टेस्ट की दरें जिस तरह लागू की हैं, उसी तरह रेमडेसीवर इंजेक्शन की दरें भी तुरंत तय करनी चाहिए। चूंकि अब कोरोना मरीजों के इलाज का जिम्मा निजी अस्पतालो पर भी डाला गया है, इसलिए इलाज का खर्च नियंत्रित करने पर भी गंभीरता से ध्यान‍ दिया जाना चाहिए। जो खबरें छन कर आ रही है, उसमें कुछ निजी अस्पताल तो कोविड इलाज के बिल लाखो में वसूल रहे हैं। ऐसे में जो गरीब कोरोना से बच भी जाए तो आर्थिक संकट से मर जाएगा।

इधर, भोपाल CMHO प्रभाकर तिवारी का कहना की - एक साथ मांग बढ़ने पर कई बार दवाओं की कमी हो सकती हैं। अगर दुकानदार या अस्पताल इसे ज़्यादा दाम में बेच रहा है तो मरीज़ शिकायत करे, हम कार्यवाई करेंगे।