
- आज देवों के देव महादेव के पुत्र श्री गणेश जी की चतुर्थी है
- गणेश पुराण के मुताबिक भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्थी पर प्रकट हुए थे भगवान श्री गणेश
- 19 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर किया जाएगा गणेश विसर्जन
भोपाल/निशा चौकसे:- आज गणेश चतुर्थी है. हमारे देश का एक खास त्योहार जिसे श्री गणेश के भक्त और अन्य लोग बड़े ही धूमधाम से मनाते हैं. हरतालिका तीज के अगले दिन से गणेश चतुर्थी पर्व की शुरुआत हो जाती है। ये पर्व पूरे 10 दिनों तक चलता है। इस साल में गणेश उत्सव की शुरुआत 10 सितंबर से होने जा रही है और इसका समापन 19 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर होगा. भगवन गणेश देवो के देव महादेव शिव के पुत्र हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश का जन्म हुआ था. आज श्री गणेश की स्थापना के शुभ मुहूर्त सुबह 11.03 से दोपहर 01.33 तक रहेगा. चतुर्थी तिथि की शुरुआत दिन में 12.18 से हो जाएगी और इसकी समाप्ति रात 09.57 बजे होगी. इस दिन वर्जित चन्द्रदर्शन का समय सुबह 09:12 से 08:53 रात तक रहेगा.
श्री गणेश जी की पूजन विधि
- प्रातः स्नान कर ले, स्नान करने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
- इसके बाद तांबे या फिर मिट्टी की गणेश जी की प्रतिमा लें।
- फिर एक कलश में जल भरें और उसके मुख को नए वस्त्र से बांध दें। फिर इस पर गणेश जी की स्थापना करें।
- गणेश भगवान को सिंदूर, दूर्वा, घी और 21 मोदक चढ़ाएं और उनकी विधि विधान से पूजा करें।
- गणेश जी की आरती उतारें और प्रसाद सभी में बांट दें।
- 10 दिन तक चलने वाले इस त्योहार में गणेश जी की मूर्ति को एक, तीन, सात और नौ दिनों के लिए घर पर रख सकते हैं।
- ध्यान रहे कि गणेश जी की पूजा में तुलसी के पत्तों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
- गणेश पूजन में गणेश जी की एक परिक्रमा करने का विधान है।
गणपति बप्पा को लगाएं भोग
गणेश जी को पूजन करते समय दूब, घास, गन्ना और बूंदी के लड्डू अर्पित करने चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं, कहते हैं कि गणपति जी को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए। मान्यता है कि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था, इससे नाराज होकर गणपति ने उन्हें श्राप दे दिया था।
गणेश जी के जन्म से जुड़ी कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार पार्वती माता स्नान करने के लिए जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर की मैल से एक पुतले का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंक दिए। माता पार्वती ने गृहरक्षा के लिए उसे द्वार पाल के रूप में नियुक्त किया। क्योंकि गणेश जी इस समय तक कुछ नहीं जानते थे उन्होंने माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान शिव को भी घर में आने से रोक दिया। शंकरजी ने क्रोध में आकर उनका मस्तक काट दिया। माता पार्वती ने जब अपने पुत्र की ये दशा देखी तो वो बहुत दुखी हो गईं और क्रोध में आ गईं। शिवजी ने उपाय के लिए गणेश जी के धड़ पर हाथी यानी गज का सिर जोड़ दिया। जिससे उनका एक नाम गजानन पड़ा
इस कारण से मनाई जाती है गणेश चतुर्थी
पौराणिक मान्यता है कि भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की तिथि पर कैलाश पर्वत से माता पार्वती के साथ गणेश जी का आगमन हुआ था। इसी कारण से इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है.