इंसानियत जिन्दा है:- मरीज की पत्नी और रोते बच्चे को देख नहीं रह पाए यह बुजुर्ग, परोपकारता की पेश की मिसाल, दे दिया अपना बेड, दो दिन बाद मौत

इंसानियत जिन्दा है:- मरीज की पत्नी और रोते बच्चे को देख नहीं रह पाए यह बुजुर्ग, परोपकारता की पेश की मिसाल, दे दिया अपना बेड, दो दिन बाद मौत
नागपुर:- इंसानियत आज भी जनता है इसका उदाहरण हम आए दिन देखते रहे इस कोरोना महामारी के दौर में जहां लोग अस्पतालों में बेड पाने के लिए मशक्कत कर रहे हैं तो वहीं एक बुजुर्ग ने एक मरीज की पत्नी और बच्चों को रोता देख अपना बेड छोड़ दिया और दो दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई.
नागपुर के रहने वाले नारायण दाभाडकर ने परोपकारिता का नई मिसाल पेश की है. दरअसल नारायण दाभाडकर ने एक युवा मरीज के लिए अपना बेड छोड़ दिया और घर चले गए. घर पर ही उनका निधन हो गया. लेकिन जाते-जाते वह एक मरीज को नया जीवन दे गए.
पूरा मामला:-
नारायण दाभाडकर कुछ दिनों पहले कोरोना संक्रमित हुए थे. जिसके बाद उनके परिजनों ने उन्हें नागपुर महानगरपालिका द्वारा संचालित इंदिरा गांधी अस्पताल में भर्ती कराया. नारायण दाभाडकर की 85 साल की उम्र और उनके शरीर में घटते ऑक्सीजन स्तर के चलते उन्हें भर्ती कर लिया गया और बेड भी मिल गया.
एक दिन नारायण दाभाडकर ने देखा कि एक 40 साल के मरीज को भर्ती कराने के लिए उसकी पत्नी और बच्चे रो-रोकर भर्ती करने की गुहार लगा रहे हैं. लेकिन उन्हें बेड नहीं मिल पा रहा है. अस्पताल में भर्ती नारायण दाभाडकर से मरीज के परिजनों का यह दुख देखा नहीं गया. इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी को फोन लगाया और बेड खाली करने की इच्छा जताई.
डॉक्टरों ने नारायण दाभाडकर से कहा कि आप की स्थिति मैं छोड़ने लायक नहीं है पर नारायण दाभाडकर नहीं माने और बोले कि मैं अपना जीवन जी चुका हूं, मुझसे ज्यादा जरूरत बेड की उस युवक को है. इसके बाद वह बेड खाली कर घर चले गए. जिसके बाद वह खाली बेड उक्त मरीज को दे दिया गया.
घर लौटने के कुछ दिन बाद ही नारायण दाभाडकर की मौत हो गई. लेकिन जाते-जाते दाभाडकर परोपकार की नई मिसाल पेश कर गए. बता दें कि नारायण दाभाडकर आरएसएस से भी जुड़े थे. दाभाडकर की बेटी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि वह अपना बेड किसी जरूरतमंद के लिए छोड़कर आए थे.
आज भी इंसानियत जिंदा है और उसका सबसे बड़ा मिसाल इस बुजुर्ग व्यक्ति ने पेश किया.

.jpeg)

.jpg)
