तो क्या सरकार ने ‘‘कृषि बिल’’ लाकर अहम की लड़ाई शुरु कर दी?
तो क्या सरकार ने ‘‘कृषि बिल’’ लाकर अहम की लड़ाई शुरु कर दी?
नई दिल्ली/ राजकमल पांडे। क्रेंद सरकार कृषि कानून बिल को वापस न लेने पर व कृषि कानून को रद्द करने की मांग के साथ किसान पिछले 27 दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हुए हैं। सरकार के साथ कई दौर की वार्ता हुई लेकिन सब विफल रहा। एक तरफ किसान इस कानून को रद्द करने से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं, तो वहीं सरकार भी अड़ी हुई है और अब तो ऐसा लगता है कि सरकार कानूनों को वापस न लेने का फैसला कर चुकी है। आपको बता दें कि किसानों और सरकार के बीच अब तक 5 से 6 स्तर की बात हो चुकी है, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हो पाई है।
क्या किया जा सकता है क्योंकि वो सरकार है और आप जनता है और सरकार व जनता में जमी आसमान का अंतर होता है, सरकार अपने हर कदम को देशहित मे ही मानता है. पर अक्सर ऐसा होता कम ही है कि सरकार के हर कदम देशहित में हो.
गौरतलब है कि सकरार ने हाल ही में चिट्ठी लिखकर किसानों को फिर से बातचीत के प्रस्ताव भेजा था। जिसपर गाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने इस बात को नकारते हुए बयान में कहा है कि, ‘हमें कृषि मंत्री से अभी तक बैठक का कोई निमंत्रण नहीं मिला है। किसानों ने निर्णय लिया है कि जब तक सरकार कृषि कानूनों को वापस नहीं ले लेती तब तक वे वापस नहीं जाएंगे। सभी मुद्दों को हल करने में एक महीने से अधिक समय लगेगा’।
किसानों के साथ संवाद को सरकार ने अहम की लड़ाई बना लिया है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि सरकार को किसानो की बात को स्वीकार करना चाहिए। आज दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर किसान अपने हक की लड़ाई लड़ रहे है। आपको बता दें कि दिल्ली के सभी बॉर्डर हजारों की संख्या में किसान इस कड़ाके की ठंड में करीब 4 हफ्तों से डटे हुए हैं और सभी किसान कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर किसा पंजाब और हरियाणा से आए हैं।



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