सिहोरा : यहां चल रहा प्रतिबंधित मांगुर मछली का धड़ल्ले से  अवैध व्यापार ….. 

सिहोरा : यहां चल रहा प्रतिबंधित मांगुर मछली का धड़ल्ले से  अवैध व्यापार ….. 

द लोकनीति डेस्क सिहोरा 
मांगुर मछली पर क्यों लगी थी रोक ??

''मछली को वर्ष 1998 में सबसे पहले केरल में बैन किया गया था। उसके बाद भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000 देश भर में इसकी बिक्री पर प्रतिबंधित लगा दिया गया था। यह मछली मांसाहारी है यह इंसानों का भी मांस खाकर बढ़ जाती है ऐसे में इसक सेवन सेहत के लिए भी घातक है इसी कारण इस पर रोक लगाई गई थी।'' 

गांधीग्राम  क्षेत्र में खुलेआम प्रतिबंधित मांगुर मछली का अवैध रूप से व्यापार हो रहा है।पिकअप वाहन में गांधीग्राम में रात में थर्मोकोल के बन्द कैरेट में जमकर मांगुर मछली आ रही हैं, इसके लिए तालाब के आसपास व कुछ व्यापारियों के घरों में मछलियों को रखा जा रहा है। लेकिन सिस्टम मौन बना बैठा है। किसी को भी न तो पर्यावरण की फिक्र है और न ही लोगों की सेहत की। यही वजह है कि तस्करों के हौंसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं। अधिकारी इस प्रकार के मामले पर उदासीन हैं।  तस्कर खुलेआम मांगुर मछली का व्यापार कर रहे हैं।


मांगुर मछली को डाला जाता है मांस,बदबू से परेशान : गांधीग्राम में कई स्थानों पर मांगुर मछली का स्टाक करके सप्लाई भी की जा रही है,जबकि, मछलियों को डाले जाने वाले सड़े गले मांस के अवशेषों से उठने वाली बदबू से आसपास के लोग परेशान हैं। लगातार स्थानीय लोग इसकी शिकायत भी कर रहे हैं, लेकिन किसी भी स्तर से ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
इन स्थानों पर बिक रही- गांधीग्राम के कूड़ा कंजई तिराहे पर चल रहे मछली बाजार में, बाजार क्षेत्र में, तालाब के किनारे, ढावों के पास इसका विक्रय किया जा रहा है।
यहाँ से निकलते है मांगुर मछली के वाहन–गांधीग्राम तालाब के आगे हाईवे के पास, कूड़ा कंजई तिराहे के रास्ते,देवनगर के अंदर के रास्ते से हाईवे पर मछली की सप्लाई बड़े मात्रा में तस्कर कर रहे हैं।
इसलिए लगी है पाबंदी: 1998 में इस मछली के पालन पर केरल में प्रतिबंध लगा था। इसके बाद भारत सरकार ने इस प्रजाति की मछली के पालन, लाने ले जाने और बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। विशेषज्ञों की माने तो इस मछली के खाने से कैंसर, त्वचा रोग जैसी घातक बीमारियां होती हैं। थाईलैंड में विकसित की गई थाई मांगुर मछली पूरी तरह मांसाहारी होती है। यह सामान्य मछली की अपेक्षा आधे से भी कम समय में पूरी तरह विकसित हो जाती है। तस्करों को इसे पालने पर ज्यादा लाभ होता है। पशुओं का सड़ा, गला मांस, मृत पशुओं के अवशेष इनको खाने के लिए डाले जाते हैं। सड़े गले मांस डाले जाने के चलते तालाब का पानी भी सड़ने के कारण जल्दी जल्दी बदलना पड़ता है। जिस कारण जहां पर मांगुर मछली का पालन किया जाता है। वहां तस्कर अवैध तरीके से कई नलकूप लगाकर भारी मात्रा में जलदोहन भी करते हैं।सड़े गले मांस के कारण जहां आसपास के लोगों को बदबू का सामना करना पड़ता है।
वहीं, जलदोहन होने से जमीन की कोख भी खाली होती है। ऐसा नहीं है कि यह पूरा मामला प्रशासनिक,मत्स्य या प्रदूषण नियंत्रण विभाग की जानकारी में नहीं है। थाने से लेकर हर स्तर पर तस्करों की पूरी सेटिग रहती है। तभी तो इनपर किसी भी स्तर से लगाम नहीं लग पाती।
इनका कहना है-

थाई मांगुर मछली बेचना मध्य प्रदेश राज्य में प्रतिबंधित है यह गैरकानूनी है! हमें इसके सीमित अधिकार हैं हम सिर्फ मांगूर मछली पकड़ कर गड्ढे खोदकर गड़वा सकते हैं और कोई कार्यवाही नहीं कर सकते! इसके लिए जब्ती आदि कानूनी कार्रवाई एवं दुकान सील करने का अधिकार संबंधित पुलिस थाने को है ! 
( जी.एस. दुबे मत्स्य अधिकारी सिहोरा )

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