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विशेष रिपोर्ट:- सरकार मौतों को रोक पाने में कैसे हुई फेल?कैसे एक वायरस ने लिया महाप्रलय का रूप? पढ़ें पूरी रिपोर्ट

विशेष रिपोर्ट:- सरकार मौतों को रोक पाने में कैसे हुई फेल?कैसे एक वायरस ने लिया महाप्रलय का रूप? पढ़ें पूरी रिपोर्ट

 द लोकनीति डेस्क : गरिमा श्रीवास्तव 

 देशभर में कोरोना अपने चरम पर है. अस्पतालों के बाहर लोगों की चीत्कार गूंजती है. श्मशान घाट में तेज उठती आग की लपट सरकार के नकारे पन को दर्शाती है. घरों में रो रही विधवा अपने किस्मत को कोसती हैं, कहीं मां की गोद सूनी हो गई, पिता के बुढ़ापे की लाठी छिन गई. मासूम बच्चे अनाथ हो गये.

 पर यकीन मानिए इन सभी लोगों की मौत सरकार के लिए सिर्फ महज एक आंकड़े हैं.

 जाने कैसे शुरू हुआ महा तांडव :-

Corona से अब तक जितनी मौतें हुई है उसका बड़ा हिस्सा यानी 60फ़ीसदी मौते दो टाइम पीरियड में हुई है.

 पहला 15 जून से 18 सितंबर 2020 के बीच कुल मौतों की करीब 38 फ़ीसदी मौतें हुई.

 और दूसरा एक 21 मार्च से 27 अप्रैल 2021 के बीच कुल मौतों की करीब 22 फ़ीसदी मौत हुई.

 विश्व की 40 फीसदी मौतें बीच के फेस यानी 18 सितंबर 2020 से लेकर 21 मार्च 2021 तक हुई. 15 जून से 18 सितंबर तक देश में कोरोना की पहली लहर तीव्र पर थी तब सबसे ज्यादा मौते हुईं.

 और 21 मार्च से लेकर अब तक कोरोना की दूसरी लहर तीव्र बनी हुइ है. और अब सबसे ज्यादा मौतें हो रही हैं.

 12 मार्च से 15 जून 2020के बीच 95 दिनों में 10000 मौतें हुईं. और अगले 95 दिनों में यानी 15 जून 2020 से 18 सितंबर तक 75 हजार से ज्यादा मौतें हुईं.

 यानी जब कोरोना शुरू हुआ तो 95 दिन में 10000 मौतें हुई और जब कोरोनावायरस पीक पर रहा तो 95 दिनों में 75 हजार से ज्यादा मौते हुईं.

 अक्टूबर2020 से कोरोना के मामले में गिरावट देखी गई जिसकी वजह से मौत के मामले भी कम होने लगे. 18 सितंबर से 5 जनवरी के बीच 109 दिन में 64 हज़ार सें ज़्यादा मौते हुईं. 5 जनवरी को मौतों का आंकड़ा डेढ़ लाख के पार हो गया. लेकिन फिर भी मौतों की रफ्तार कम हुई थी कहां 95 दिनों में 75000 से ज्यादा मौतें और कहां 109 दिन में 65000 मौतें.

5 जनवरी से 21 मार्च के बीच 75 दिनों में 9852 मौतें हुई. यानी कह सकते हैं कि मौतों की रफ्तार में भारी कमी आई थी.

 अगर हम इन दोनों समय अवधि को जोड़ दें तो देखेंगे कि 18 सितंबर से 5 जनवरी + 5 जनवरी से 21 मार्च इन लगभग 6 महीनों में 74 हज़ार मौतें हुईं. इन 6 महीनों की तुलना जून से सितंबर वाले मौतों से करें तो देखेंगे कि इन महीनों में मौत की रफ्तार आधी रही.

 और लापरवाही तब हुई जब क्रिकेट स्टेडियम लबालब भरे रहे, चुनावी रैलियां जोरों शोरों से हुई, कई जगहों पर त्यौहार भी जोरों शोरों से मनाए गए. सभी नियमों को ताक पर रखकर पांच राज्यों में ताबड़तोड़ रैलियां हुईं. और नतीजा यह हुआ कि स्थिति बद से बदतर हो गई. महाकुंभ भी हुआ. नतीजतन 21 मार्च से लेकर 27 अप्रैल तक 37 दिनों में 42162 मौतें हुई. और मौतों की रफ्तार लगातार तेज हुईं.देश में कोरोना सें होने वाली मौतों का आंकड़ा 200000 के पार पहुंच गया.

 अप्रैल में हर रोज औसतन डेढ़ हजार से 2000 तक मौतें हुई हैं.

 पर इन आंकड़ों को पढ़ते हुए आप यह ध्यान रखें कि ये आंकड़े सरकारी हैं असल में जमीन पर कुछ और ही है. सरकारी आंकड़ों को ही देखें तो यह स्थिति साफ समझ में आएगी कि दुनिया में हर पांचवीं मौत भारत से हो रही है. यह  महाप्रलय कब थमेगा इसे लेकर कुछ भी नहीं कह सकते हैं.

 सरकार झूठे आंकड़े झूठे दावे लगातार करती रही है. पश्चिम बंगाल में अब चुनाव हो जाने के बाद लॉकडाउन जैसी पाबंदियां लगानी शुरू हो गई है, यानी अब ऐसा लग रहा है कि सरकार को पश्चिम बंगाल में संक्रमण दिखाई देने लगा है.

 स्थिति कब सुधरेगी इसका अंदाजा लगा पाना भी इस वक्त मुश्किल ही है.

 यह आंकड़े बताकर हमारा मकसद आप सभी को डराना बिल्कुल नहीं है बल्कि यह समझाना है कि भारत में हर चीज अब हम आम जनता को सोच समझकर ही करनी होगी. चाहे वह देश की सरकार का चुनाव हो चाहे वह राज्य सरकार का हो. इन नेताओं को किसी के भी मर जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. फर्क तो उन्हें पड़ रहा है जो अपनों को खो रहे सरकार के लिए यह मौत सिर्फ एक आंकड़े हैं पर जमीन पर जिन लोगों ने अपने परिजनों को खोया है उनके दर्द को समझ पाना भी हमारे आपके लिए बेहद मुश्किल है.

 सभी से निवेदन है कि सबसे पहले खुद का ध्यान रखें क्योंकि कोई भी चुनाव कोई भी परिणाम आपके हित में नहीं होंगे.वह सिर्फ उन्हीं लोगों तक सीमित है जिनके पास ऊंची कुर्सियां है. जनता को हमेशा छला गया है और लगातार छला जा रहा है. इसीलिए सभी अपनी सुरक्षा को प्रथम वरीयता दें. लोकनीति के टीम की आप सभी से गुजारिश है कि बेवजह कहीं ना जाए खुद का और अपने परिवार का ख्याल रखें.

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