
By: Anjali Kushwaha
ग्वालियर: ग्वालियर में डबरा-भितरवार के बाढ़ प्रभावित इलाकों में अभी भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं. इंफ्रा स्ट्रक्चर तो दूर की बात राहत सामग्री तक समय पर उपलब्ध नहीं हो पा रही है. डबरा के चांदपुर गांव के लोग नेशनल हाइवे-44 के किनारे तंबू गाड़ कर किसी तरह जिंदगी को पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे हैं. एक तरफ तो प्रशासन की ओर से इनके रहने के लिये शरणार्थी केप की व्यवस्था की गई है, लेकिन हकीकत में एक बड़ी आबादी सर पर छत का साया न होने पर नेशनल हाईवे नं. 44 पर साड़ी और पन्नी का तंबू गाढ़कर अपना जीवन गुजार रहे हैं. हाइवे पर गुजरते तेज रफ्तार वाहनों से दिन-रात दहशत बनी हुई है. प्रशासन से भी इन्हे कोई राहत सामग्री नहीं मिल रही है.
प्रशासन भी अभी तक उनके पास सर्वे के लिए नहीं पहुंचा है. गांव के लोगों का कहना है कि जब अभी तक हमारा सर्वे ही नहीं हुआ है तो राहत कब मिलेगी.
ग्वालियर-चंबल अंचल में आई बाढ़ को 14 दिन बीत गए हैं, लेकिन बाढ़ पीड़ितों की जिंदगी पटरी पर आते हुए नहीं दिख रही है. डबरा के चांदपुर गांव में सिंध, पार्वती और नोन नदी में उफान आने पर पूरा गांव टापू बन गया गया था. करीब 580 मकान पानी में डूब गए थे. 260 कच्चे और पक्के मकान जमीन में मिल गए थे. इनके लिए शासन राहत कैंप बनाने का दावा कर रहा है, लेकिन जिनके आशियाने उजड़ गए हैं उनके लिए संकट खत्म नहीं हुआ है. वह हाइवे पर तंबू लगाकर रहने को विवश हैं.
कुछ गांव के लोगों का कहना है कि एक सर्वे की टीम आई थी तो वह पानी में बहे पशुओं के शव मांग रही थी. अब यह कैसे संभव है.