
भोपाल/खाईद जौहर : मध्यप्रदेश की 4 खाली पड़ी सीटों पर होने वाले उपचुनावों में सबसे लोकप्रिय सीट खंडवा लोकसभा की मानी जा रहीं हैं। इस लोकसभा सीट पर BJP का कब्जा रहा है। BJP के नंदकुमार सिंह चौहान यहां से सांसद थे, लेकिन कोरोना काल में उनका निधन होने से यह सीट खाली है। यहां पर BJP को सहानुभूति वोट मिलने की उम्मीद है, लेकिन नंदकुमार सिंह चौहान के बेटे हर्षवर्धन पूर्व मंत्री के अलावा अर्चना चिटनीस और कृष्ण मुरारी मोघे टिकट की दौड़ में शामिल हैं।
BJP के सामने यहां पर उम्मीदवार घोषित करने को लेकर असमंजस की स्थिति है। इधर कांग्रेस से अरुण यादव को टिकट मिलने की उम्मीद है, लेकिन बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा अपनी पत्नी को उम्मीदवार बनाने के लिए ताकत लगा रहे हैं। ऐसे में भितरघात का डर भी कांग्रेस को सता रहा है।
इसी बीच खबर है कि अरुण यादव दिल्ली पहुंच गए है, जहां वो आज प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात करेंगे। पार्टी सूत्रों ने बताया कि अरुण यादव दिल्ली प्रवास के दौरान प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक से भी मुलाकात कर सकते हैं। दरअसल, अरुण यादव इस सीट से उम्मीदवार मानें जा रहे है लेकिन निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा अपनी पत्नी के लिए टिकट की मांग कर रहे हैं।
बता दें कि 1962 से अब तक हुए 15 चुनाव में इस सीट पर 8 बार भाजपा तथा बीएलडी और 7 बार कांग्रेस का कब्जा रहा है। नंदकुमार सिंह चौहान और अरुण यादव के बीच तीन बार मुकाबला हुआ। इनमें दो बार अरुण यादव को हार का सामना करना पड़ा है। दिवंगत सांसद चौहान ने 6 बार खंडवा लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया।
कहा जा रहा है कि कमलनाथ 2 अक्टूबर को भोपाल में उपचुनाव के प्रभारी और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगे। कांग्रेस की रणनीति है कि चारों सीटों के प्रत्याशियों की घोषणा भाजपा से पहले कर दी जाए।
बताया जाता है कि कमलनाथ भोपाल आने से पहले प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ संभावित प्रत्याशियों को लेकर विचार विमर्श कर सकते हैं, क्योंकि वे अपने स्तर पर प्रत्याशी चयन के लिए सर्वे करा चुके हैं। यही वजह है कि अरुण यादव इस बैठक से पहले कमलनाथ व वासनिक से मुलाकात करना चाहते हैं।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में होने वाले चुनावों की तारीखों का ऐलान होने से पहले ही दोनों दलों ने रणनीति तेज करने के साथ नेताओं की तैनाती भी शुरू कर दी थी। क्योंकि ये उपचुनाव को 2023 की सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा है। हालांकि, प्रदेश सरकार को इस उपचुनाव में हार-जीत से ज़्यादा कोई असर नहीं पड़ेगा। फिर भी यह चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का है।