
FILM THAPPAD: उसने मुझे मारा पहली बार,और वो नही मार सकता, तापसी के इस डॉयलाग की तरह सच्चाई को बयां करती है फिल्म: REVIEW
कबीर सिंह को भारत में बहुत पसंद किया गया लेकिन क्या आप तापसी की थप्पड़ को पसंद कर पाएंगे। क्योंकि असल जिंदगी से जुड़े कुछ जरुरी सवाल है जो इस फिल्म को देखने के बाद आपके मन में जरुर उठेंगे। वैसे तो फिल्म के नाम से ही आधी कहानी बयां हो जाती है लेकिन कहानी को पूरा समझना बेहद जरुरी होता है। थप्पड़' एक ऐसी महिला की कहानी है जो ये मानती है कि ये थप्पड़ सिर्फ गुस्से में किया गया एक फिजिकल एक्ट नहीं, बल्कि इससे ज्यादा है… ये एक टॉक्सिक मेंटालिटी का हिस्सा है जिसमें इन 'छोटी बातों' का शादी पर फर्क नहीं पड़ना चाहिए. शादी के बाद लड़िकयों को अक्सर एक थप्पड़,दो थप्पड़, या बार-बार के थप्पड़ पर रिएक्ट करने के लिए साफ मना किया जाता है क्योंकि इसे Indian society का सो कॉल्ड शादी में किया जाने वाला एडजेस्टमेंट कहा जाता है। जो सिर्फ एक महिला यानि की आपकी जिम्मेदारी होती है।
अब बात तापसी की फिल्म थप्पड़ की कहानी के बारे में
अमृता यानि कि तापसी पन्नू का रोज का रूटीन है. वो सुबह उठती है, दूध लेने के लिए घर का दरवाजा खोलती है, अखबार उठाती है, चाय बनाती है, पति का अलार्म बंद करती है, उसे चाय देती है, अपनी सास का खयाल रखती है, चाय पीते वक्त थोड़ा समय अपने लिए निकालती है, फोन से फोटो खींचती है, पड़ोसी की तरफ देखकर मुस्कुराती है, पति के लिए लंच पैक करती है, पति जल्दी में घर से निकल रहा होता है तो उसकी तरफ दौड़ती है, उसका वॉयलेट, बैग और टिफिन उसे देती है और फिर… चैन की सांस लेती है! अमृता का रूटीन इतनी बार दिखाया गया है कि आखिर में हमें ये याद हो जाता है. बल्कि, ये रूटीन उस घटना यानि कि जब अमृता के पति ने उसे थप्पड़ मारा था उसके बाद भी फॉलो किया जाता है. ये थप्पड़ अचानक से होता है. पति किसी बात पर परेशान होता है, तो लोग उसे घेरकर खड़े हो जाते हैं. बाकी लोग हैरान हैं क्योंकि ये सब मेहमानों के सामने हुआ. सभी आगे बढ़ जाते हैं और फिर उन्हें एहसास होता है कि अमृता इस घटना से आगे नहीं बढ़ी है! थप्पड़' एक ऐसी महिला की कहानी है जो इसे भूलकर आगे बढ़ने से मना करती है. ये एक ऐसी महिला की कहानी है जो ये मानती है कि ये थप्पड़ सिर्फ गुस्से में किया गया एक फिजिकल एक्ट नहीं, बल्कि इससे ज्यादा है… ये एक टॉक्सिक मेंटालिटी का हिस्सा है जिसमें इन 'छोटी बातों' का शादी पर फर्क नहीं पड़ना चाहिए.से कही ज्यादा है। अनुभव सिन्हा के डायरेक्शन में बनी 'थप्पड़' की खासियत उसके शांत लम्हों में है जो ज्यादा कुछ न कहकर भी एक आम जिंदगी जीने वाली महिला के दिल के अंदर तक प्रवेश कर सकती है।जब अमृता यानि कि तापसी पन्नू अपने पति के बर्ताव को सहने से मना करती है, तो उसके फैसले को कई तरह से देखा जाता है. ‘एक थप्पड़? एक थप्पड़ ही तो है.’ अमृता उन सभी को समझाने की कोशिश करती है कि ये कभी इस बारे में नहीं था कि उसे कितनी बार मारा गया या हिंसा कितनी खतरनाक थी, बल्कि ये इस बारे में है कि ये हुआ… इतने नॉर्मल तरीके से. अनुभव सिन्हा की फिल्म पर अच्छी पकड़ है. ऑडियंस की तरह, अमृता के आस-पास हर कोई धीरे-धीरे स्थिति को समझने और इसपर अपनी प्रतिक्रिया देने की कोशिश करता दिखता है.
तापसी पन्नू का काम फिल्म में हर बार की तरह बहुत सेंसटिव और शानदार है. इमोशनली और फिजिकली, वो अपने किरदार और उसकी समझ को अच्छे से दिखाती हैं. अपने पिता (कुमुद मिश्रा) के साथ तापसी का रिश्ता और उनके बीच के पल, फिल्म के सबसे खूबसूरत पलों में से एक हैं. खुद एक शानदार परफॉर्मर, कुमुद मिश्रा, पिता के रोल में जंच रहे हैं.वही अमृता के पति के रोल में पावेल गुलाटी ने भी अच्छा काम किया है. उसने गलत किया है, लेकिन वो एकदम ब्लैक कैरेक्टर नहीं है, ऐसे में जो परेशानी उन्होंने दिखाई है, वो कैरेक्टर को रिलेटेबल बनाती है. 'थप्पड़' कुछ और जरूरी मुद्दों को लेकर भी सवाल खड़े करती है: एक परिवार को जोड़कर रखने के लिए क्या चाहिए? क्या सभी गलत बातों को चुपचाप सह लेना चाहिए? और क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ महिला की है? यकीन मानिए ये फिल्म खत्म होने के बाद भी ' आपके साथ रहेगी क्योंकि ये आपके इर्द-गिर्द घूमती है और आप इसको अपनी ज़िंदगी में बहुत तरीके से रिलेट करेंगे।.