कमलनाथ सरकार ने अतिथि विद्वानों को किया था फाॅलेन आउट, "शिव राज" में भी नहीं हुई सेवा बहाली, सभी वादे झूठे
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कमलनाथ सरकार ने अतिथि विद्वानों को किया था फाॅलेन आउट, लेकिन शिवराज सरकार ने भी अब तक नहीं की इनकी सेवा बहाली, सभी वादे झूठे
भोपाल/गरिमा श्रीवास्तव:- प्रदेश की शिवराज सरकार से सेवा बहाली और नियमितीकरण की उम्मीद में शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत और फाॅलेन आउट उच्च शिक्षित अतिथि विद्वानों 1 साल से अधिक समय बीत गए हैं. वैसे तो इससे पूर्व भी इन्होने कांग्रेस और भाजपा सरकार दोनों में ही लगातार सेवा दी है। परंतु जब पूर्व कमलनाथ सरकार में वर्तमान भाजपा सरकार विपक्ष में थी, उस समय इनकी मांग को न्यायसंगत और जायज बताया था। वहीं मार्च 2020 से पुनः प्रदेश में भाजपा के सत्ता हासिल करने बाद से ही हर बार इनकी समस्या का शीघ्र हल निकालने की बात प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव इनके द्वारा ज्ञापन देते समय और मिलने पर कहते हैं। लेकिन अब तक इनका भविष्य सुरक्षित नहीं किया है।
इनको पिछली कमलनाथ सरकार ने दिसंबर 2019 में फाॅलेन आउट किया था। इनके पदों पर विवादास्पद सहायक प्राध्यापक भर्ती 2017, ग्रंथपाल और कीड़ा अधिकारी की नियुक्ति करके इनका रोजगार छीन लिया था। उनमें से शेष तो अलग अलग चरणों में व्यवस्था में आ गए हैं, लेकिन 600 अभी भी फाॅलेन आउट है। जो आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान चल रहे हैं।
वहीं इनके मुद्दे पर सड़क पर उतरने वाले और इनकी तलवार और ढाल बनने वाले वर्तमान राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया से अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. सुजीत सिंह भदोरिया ने अपनी टीम के साथ सोमवार को ग्वालियर में अतिथि विद्वानों का नियमितीकरण करने और फाॅलेन आउट को व्यवस्था में लेने के लिए ज्ञापन सौंपा था। जहां पर बातचीत में ज्योतिराज सिंधिया ने कहा कि, ” आपका मुद्दा मुझे ध्यान है। मैंने आपके संबंध में सीएम साहब से बात कर ली है, आपकी समस्या का समाधान शीघ्र हो जाएगा। “
परंतु अतिथि विद्वानों ने ऐसे ज्ञापन कई बार ज्योतिराज सिंधिया को दिए हैं। उस समय भी इन्हें केवल आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला हैं। वहीं प्रति सप्ताह फाॅलेन आउट की भर्ती के कई चरण निकल चुके हैं, फिर भी इनका दर्द दूर नहीं हुआ है। उल्टा इनके पदों पर कोर्ट के माध्यम से कई नवीन अभ्यर्थियों को बगैर अनुभव के भी सीधे मेरिट के आधार पर ले लिया गया है। जब इस संबंध में उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों को अतिथि विद्वान फोन या अन्य माध्यम से बातचीत करते हैं तो इन्हें जवाब में न्यायालय का आदेश मानने की बात कहते हैं। जबकि एमपी पीएससी से हुई नियमित भर्ती पर कई मामले हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन थे, परंतु उन सबको नजरअंदाज करके पूर्व कमलनाथ सरकार ने नियुक्ति दे दी थी। आखिर उस समय कोर्ट के नियमों को क्यों नहीं माना गया था। यह विचारणीय प्रश्न है।
अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी ने इस बारे में बताया है कि, ” अतिथि विद्वानों के भविष्य के साथ राजनीतिक खेल खेला जा रहा है। जिसके कारण हमारा जीवन बर्बाद हो चुका है। पहले तो कई वर्षों तक नियमित भर्ती का आयोजन नहीं किया गया और जब एक बार किया गया तो उसमें भी अतिथि विद्वानों को 5 प्रतिशत बोनस अंक देकर सरकार ने छुटकारा पा लिया था। अब तो सरकार को हम पर दया करना चाहिए। अधिक उम्र के मोड़ पर अब हम कहां जाएंगे। “

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