शिवराज सरकार में प्रसूताओं को एंबुलेंस मुहैया नहीं, खाट पर तय करनी पड़ रही लंबी दूरी

शिवराज सरकार में प्रसूताओं को एंबुलेंस मुहैया नहीं, खाट पर तय करनी पड़ रही लंबी दूरी

 

मध्यप्रदेश/भोपाल:
गांव-गांव तक सड़क, बिजली और शौचालय पहुंचाने का दावा करने वाली शिवराज सरकार में कई जिलों से प्रसूताओं को खाट पर ले जाने की तस्वीरें आम हैं। कहीं सड़क की वजह से जननी एक्सप्रेस नहीं पहुंच पाती, तो कहीं जननी एक्सप्रेस ही नहीं है। महामारी के दौर में भी एंबुलेंस को लेकर ये तस्वीरें बदली नहीं हैं, जबकि सबसे ज्यादा बजट स्वास्थ्य विभाग पर ही खर्च हो रहा है।

कुछ दिनों पहले बालाघाट के नकटाटोला गांव में एक आदिवासी प्रसूता महिला को खाट पर लिटाकर तीन किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी। प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों ने एम्बुलेंस को सूचना दी, लेकिन हुडडीटोला से नकटाटोला के बीच तीन किलोमीटर तक सड़क थी ही नहीं। परिजन खाट में लिटाकर रजनी मरकाम को मुख्य मार्ग तक ले गये और फिर वो अस्पताल पहुंचीं। उनके पति सुनील मरकाम ने कहा एंबुलेंस को फोन लगाया था वो कीचड़ की वजह से आ नहीं पाई। कोई साधन नहीं था खटिया में ले गये मेन रोड तक वहां गाड़ी आई… 10-15 साल से रोड नहीं है। नकटाटोला गांव में बैगा आदिवासी रहते हैं. यहां सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्र, राशन, आवास योजना, उज्जवला टाइप सारी चमचमाती सरकारी स्कीम मिट्टी में सनी नज़र आती हैं।

यहां रहने वाले सोनसिंह बैगा कहते हैं, यहां रोड कीचड़ से सन जाती है, कोई बीमार हो गया तो धीरे धीरे पैदल जाते हैं. पिछले साल ही अगस्त में बालाघाट के ही गणखेड़ा में एक आदिवासी बैगा तक जननी एक्सप्रेस नहीं पहुंच पाई और प्रसूता की डिलीवरी बैलगाड़ी में हुई जिसकी तस्वीरें सुर्खियों में रही थीं।

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