रूस और फिलीपींस के इन दो पत्रकारों को मिला Nobel शांति पुरस्कार 2021

रूस और फिलीपींस के इन दो पत्रकारों को मिला Nobel शांति पुरस्कार 2021
  • दो पत्रकारों को मिला नोबेल शांति पुरस्कार 
  • 86 साल के बाद पत्रकारों को मिला दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार
  • 1935 में जर्मन पत्रकार कार्लपोर्न को मिला था यह पुरस्कार 

पीयूष परमार :
हक के लिए आवाज उठाना, अभिव्यक्ति की आजादी को जिंदा रखना ,निरंकुश सरकारों को उनका आइना दिखाना और उनके खिलाफ लगातार संघर्ष करते रहना । यही काम होता है एक पत्रकार का और सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि 86 साल के बाद किसी पत्रकार को शांति का नोबेल मिला है कल नोबेल कमेटी ने रूस के पत्रकार दिमित्री मुरातेव और फिलीपींस की मारिया रेसा को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की घोषणा की कमेटी ने कहा "इन दोनों ने बोलने की आजादी की रक्षा की पुरजोर कोशिश की। यह लोकतंत्र और शांति के लिए जरूरी शर्त है.ये दुनिया के उन पत्रकारों के प्रतिनिधि हैं,जो अपनी-अपनी जगहों पर विपरीत हालात में संघर्ष करते हुए लोकतंत्र और प्रेस की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे हैं". 
बता दें कि नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित और बहुचर्चित पुरस्कारों में से एक है खुशी की बात यह है कि 86 साल के बाद किसी पत्रकार को नोबेल मिला । इससे पहले 1935 में जर्मन पत्रकार कार्लपोर्न को पुनः नोबेल मिला था ।

जानिये कौन हैं मारिया रेसा 
126 साल के इतिहास में मारिया 18वीं महिला है जिन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला है। मारिया 2018 को Time Magazine ने पर्सन ऑफ द ईयर नामित किया था। मारिया रेसा तानाशाही और सत्ता के दुरुपयोग के खिलाफ जमकर आवाज उठाती हैं उन्होंने फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते सरकार से लगातार लोहा लेतीं रहीं। मारिया ने देश में तानाशाही और सत्ता के दुरुपयोग का खुलासा किया। 'नशे के विरुद्ध युद्ध' में मानवाधिकार हनन और हत्याओं को सामने लाया, बताया कि सरकार ने सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें फैलाई विरोधियों को परेशान और बदनाम किया।

कम रोचक नहीं है दिमित्री की पत्रकारिता 
दिमित्री जिस अखबार में काम करते हैं उस अखबार के 28 सालों में छह पत्रकारों की हत्या कर दी गई लेकिन फिर भी दिमित्री लगातार स्वतंत्र नीति अखबार छोड़ने से इनकार करते रहे और उन्होंने पत्रकारिता के नैतिक मानकों का पालन करते हुए, अपने पत्रकारों के लिए भी कुछ लिख सकने के अधिकार का हमेशा बचाव किया। पुरस्कार मिलने की घोषणा पर उन्होंने कहा कि इस पुरस्कार का देश मैं ही नहीं ले सकता या उनका है जिन्होंने बोलने की आजादी की हिफाजत करते हुए अपनी जान गवा दी। दिमित्री 1993 में स्थापित स्वतंत्र समाचार पत्र "लुगाया गजेटा" के संस्थापकों में से एक है सरकारी उत्पीड़न ,धमकियों ,हिंसा और पत्रकारों की हत्याओं के बावजूद दिमित्री 1995 से इस अखबार के लगातार प्रधान संपादक पद पर बने रहे हैं और लगातार सच उजागर करते रहे हैं. दिमित्री के अखबार नोवाया गजेटा को रूस का सबसे ज्यादा भरोसेमंद जरिया माना जाता है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के तानाशाही रवैया के खिलाफ उनके विरोधी और दिमित्री जैसे पत्रकार लगातार आवाज उठाते रहे हैं लेकिन पुतिन के खिलाफ आवाज उठाने का खामियाजा लगातार मिलता रहा है लेकिन उन सभी दिमित्री उन सभी में एक प्रमुख आवाज के तौर पर उभरे हैं।
दिमित्री ने कहा कि हम इस पुरस्कार का उपयोग रूसी पत्रकारिता के लिए लड़ने के लिए करेंगे जिसे अब दबाने की कोशिश हो रही है ।
नोबेल पुरस्कार विजेता को 8.30 करोड़ की राशि मिलती है । इन दो पत्रकारों का चुनाव 329 उम्मीदवारों में से किया गया पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थर्नबर्ग, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स, डब्ल्यूएचओ भी इस पुरस्कार की कतार में थे। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी एक समिति के अनुसार पिछले एक दशक में फिलीपींस में 17 और उसमें 23 मीडिया कर्मियों की हत्या हुई है। 
 

क्या है भारत की पत्रकारिता की मौजूदा स्थिति?
नोबेल शांति पुरस्कार में दो पत्रकारों को पुरस्कार दिए जाने के बाद अगर हम अपने देश भारत की पत्रकारिता के बारे में करें तो आज भारत की पत्रकारिता लगभग सरकारी हो चुकी है, दरबारी हो चुकी है। आज लगातार सरकार से सवाल न करके मीडिया विपक्ष से सवाल करती है, आंदोलनकारियों से करती है, प्रदर्शनकारियों से करती है । आज का मीडिया एकतरफा हो गया है। गोदी मीडिया जैसे शब्दों की उत्पत्ति यही बताता है की आज देश में लगातार ऐसे पत्रकारों की बाढ़ आ चुकी है जो सरकार की तरफ से विपक्ष से सवाल करते हैं, ना कि विपक्ष की तरफ से सरकार से सवाल करें और ऐसी पत्रकारिता के खिलाफ लगातार भारत के जनमानस में गुस्सा उत्पन्न हो रहा है और यह एक दिन जरूर फूटेगा, इस बात का मुझे ,आपको और पूरे भारत वासियों को भरोसा है क्योंकि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा खंभा होता है लेकिन यह चौथा खंभा आज लोकतंत्र की पूरी छत को गिराने के लिए आमादा हो चुका है। लेकिन बड़ी बात यह भी है और आशा की किरण भी इस अंधेरे में दिखती है कि अभी भी कुछ ऐसे पत्रकार जीवित हैं। ऐसे मीडिया संस्थान जीवित हैं जो लगातार बोलने की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों और पत्रकारिता के मानकों को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। भले ही उनको आज सरकारी विज्ञापन न मिलते हों, भले ही उनको कितनी धमकियां आती हो, उनको देख लेने जैसी बातें आए दिन रोज कहीं जाती हों, चाहे ट्विटर पर ,फेसबुक पर उनको भर भरके गालियां दी जाती हों। लेकिन आज भी ऐसे मीडिया संस्थान अस्तित्व में हैं जो पत्रकारिता को जीवित रखे हैं. द लोक नीति भी ऐसी ही पत्रकारिता को लगातार करने के लिए प्रतिबद्ध है हम ऐसी पत्रकारिता अवश्य करते रहेंगे।