जेएनयू मुद्दे पर द लोकनीति के सम्पादक आदित्य सिंह का लेख - मोदियाबिंद एक लाइलाज बीमारी!

जेएनयू मुद्दे पर द लोकनीति के सम्पादक आदित्य सिंह का लेख - मोदियाबिंद एक लाइलाज बीमारी!

जेएनयू मुद्दे पर द लोकनीति के सम्पादक आदित्य सिंह का लेख - मोदियाबिंद एक लाइलाज बीमारी!

पूरा देश मोदियाबिंद का शिकार हो गया है, कुछ दिखाई नहीं दे रहा है, ये रोग महसूस करने की क्षमता को नष्ट कर देता है और इसी रोग के कारण आपकी राजनीतिक समझ कंडम और खोखली हो जाती है।कल तक 100 रुपये लीटर बिकने वाले पेट्रोल को खरीदने के लिए जो मीडिया आपको राष्ट्रभक्ति के नाम पर कन्वेंस कर रही थी आज वही आपसे आपका सबकुछ छीन रही है। कल आप या आपका बच्चा जब पढ़ने के लिये बाहर निकलेगा तो उसे कोई जेयनयू नहीं मिलेगा। शिक्षा जो लोकतंत्र में हर नागरिक का अधिकार होती है उसे पहले ही इस देश में प्रोडक्ट की तरह बेचा जा रहा था लेकिन अब उसकी बोली लगेगी जिसके लिये आपको खेत या घर बेचना पड़ेगा फ़िर किसी दो कौड़ी के प्राइवेट कॉलेज से डिग्री लेकर आपका बच्चा बेरोजगारी का विक्टिम हो जायेगा।

माना कि आप सभी सुल्तान ए हिंद के जादूगरी के कायल हैं, 5 ट्रिलियन जितना बड़ा झूठ और फरेब है आप उसे उतना ही सच मान बैठे हैं, लेकिन प्रश्न करना आप भूल गये हैं। 2019 से पहले नहीं जाऊंगा, नहीं तो आप पूछ लेंगे कि सुलतान ए हिंद इतना ही बड़ा झुठ्ठा है तो फ़िर उसे क्यों लोगों ने तख्त सौंप दिया? जाहिर है मेरे पास एक ही जवाब होगा कि सत्ता में आने का मतलब ये नहीं कि साहिब विकास पुरुष हैं, सत्ता में आने के और भी फैक्टर होते हैं जैसे कि कमजोर विपक्ष, बिकी हुई मीडिया, सोशल मीडिया का प्रोपागेंडा, फर्जी राष्ट्रवाद और पाकिस्तान लेकिन आप मेरे इस तथ्य को मानने से रहे! क्योंकि मीडिया ने जो गोबर आपके दिमाग में भर दिया है उसका प्रभाव बहुत प्रबल है, शायद वो प्रभाव गाय का है, ख़ैर कुछ तथ्यों की तरफ ले चलता हूं।जेएनयू भारत की वो यूनिवर्सिटी जहां के सस्ते मॉडल से पढ़ कर निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री हो गईं और एस जयशंकर पहले आईएफएस और फ़िर विदेश मंत्री हो गये, आज उन्हीं की सरकार इन बच्चों को घेर कर पीट रही है, इनका कुसूर इतना है कि ये सभी बच्चे फीस बढ़ोत्तरी का विरोध कर रहे हैं, सवाल फीस बढ़ने का नहीं है, सवाल है कि भारत में जेएनयू जैसे कुल कितने संस्थान हैं? सही उत्तर देने वाले को किडनी बेंच कर आई फोन दूँगा जिसमें देश का सबसे घटिया ड्रामा शो " नेशन वांट्स टू नो" देखा जा सकेगा।

भारत में 18 - 23 साल के स्कूली बच्चों का उच्च शिक्षा में जाने का औसत महज 25 % है, जरा फिर से पढ़िये विश्वगुरु भारत की आदर्श शिक्षा कि ये दशा, भारत में 18 - 23 साल के स्कूली बच्चों  का उच्च शिक्षा में जाने का औसत महज 25 % है, बाकी के 75 % ट्विटर पर मोदी के अश्लील सिपाही बनकर लोगों को गालियां बक रहे हैं। ख़ैर ये तो सुलतान ए हिंद की खिदमत का सवाल है जो आप करते रहिये और मूलभूत चीजों के लिये तरसते रहिये। लेकिन प्रश्न करना मत भूलिये, प्रश्न करिये कि न्यू इंडिया या यंग इंडिया के 75% युवा स्कूल से आगे का सफर क्यों नहीं कर पाते? जवाब आप के पास है जनाब, अच्छा चलिये मैं बता देता हूं, आप अपनी अर्थिक स्थिति का आंकलन कीजिये और सोचिये कि आप को पढ़ने के लिये क्या - क्या त्यागना पड़ता है या आपके माँ - बाप को किस दौर से गुजरना पड़ता है।

अब सवाल है कि आप की ऐसी हालत क्यों है? उत्तर सुनिये - क्योंकि आप जिस देश में रह रहे हैं उसकी अर्थव्यवस्था राम मंदिर के निर्णय के बाद 5 ट्रिलियन होने वाली है। आप उस देश में रह रहे हैं जिस देश में किसान ताबड़तोड़ आत्महत्या कर रहा है, जिस देश के नेता आपको धर्म के नाम पर दंगा करने को कह रहे हैं, जिस देश की मीडिया आपको भूखे पेट पाकिस्तान पर कथित डिबेट दिखा रही है, असल में वह देश आर्थिक रूप से ध्वस्त हो चुका है, बर्बाद हो चुका है, जिसका ग्रोथ रेट 5% फ़ीसदी पहुंच चुका हो, पिछले 20 सालों में सबसे कम। जहां के लोगों की अपने ऊपर खर्च करने की क्षमता पिछले 40 सालों में सबसे कम हो गई हो, महज 1400 - 1500 रुपये प्रति माह, लाइक सीरियसली! क्या बात कर रहे हैं, उससे 50 गुना ज्यादा का तो सुलतान ए हिंद महीने में मशरूम खा जाते हैं। ख़ैर मैं कहां था, ओह हां अर्थव्यवस्था पर, जिस देश में लघु और मध्यम उद्योग नष्ट हो गया हो आप उसी देश के निवासी हैं, तो खाली झोली वाले असली फकीरों बताइये मुझे शिक्षा की नीलामी में बोली लगा पायेंगे? अगर नहीं तो जेएनयू में जो कुछ भी हो रहा है, जिस भी राजनीतिक विचारधारा के क्षेत्र ऐसा कर रहे हों वो शिक्षा की मांग रहे हैं, इस देश में गरीब, गरीबी रेखा से नीचे, और मध्यम आय में गुजर बसर करने वालों लोगों की संख्या कुल जनसंख्या की 75 % फीसदी के आसपास है, ये लड़ाई आप 75%फीसदी की है जिसके लिये दिल्ली पुलिस उन छात्रों को दौड़ा - दौड़ा कर मार रही है।

मतलब कुछ भी दिखा दिया जा रहा है आप उस पर विश्वास कर ले रहे हैं, हर वो व्यक्ति जो प्रश्न करे उसे साहिब के शान में गुस्ताखी बता कर देशद्रोही और टुकड़े - टुकड़े गैंग का नाम दिया जा रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है! चलिये मेरी बात मत मानिये जरा खुद से एक सवाल करिये कि पिछला वो कौन सा आदमी आपको याद आ रहा है है जिसने मौजूदा सरकार से प्रश्न किया हो और उसी का प्रश्न मीडिया ने उठाया हो बजाय उसे देशद्रोही बताने के? नहीं याद आया! ज्यादा पीछे मत जाइये नहीं तो अन्ना और रामदेव याद आने लग जायेंगे जो उस सरकार की बात थी।

इससे पहले कि शिक्षा को आपसे दूर ही नहीं बल्कि पूरी तरह से छीन लिया जाए, आप अपना सबकुछ दावं पर लगा दीजिये, क्योंकि फ़िर कह रहा हूँ बात जेएनयू की नहीं है, बात फीस की भी नहीं है, बात है जो कुछ बचा हुआ है उसे बचाने की। बचाइये या बराबर हो जाइये।।