सिहोरा : प्रदूषण फैल रहा,कलेक्टर जबलपुर के आदेश की उड़ाई जा रही धज्जियां ,जल रही पराली पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं

सिहोरा : प्रदूषण फैल रहा,कलेक्टर जबलपुर के आदेश की उड़ाई जा रही धज्जियां ,जल रही पराली पर प्रशासन का कोई नियंत्रण नहीं
- जबलपुर कलेक्टर कर्मवीर शर्मा का सरकारी फ़रमान कृपया किसान न जलाये पराली
- कलेक्टर साहब की सुनने को तैयार नहीं किसान ,न प्रशासनिक अधिकारियों ने की कोई पहल
- पराली को गलाने के लिए दिल्ली सरकार की तरह कोई व्यवस्था मध्यप्रदेश में नहीं ,न ही कोई जागरूकता
द लोकनीति डेस्क सिहोरा
शशांक तिवारी की रिपोर्ट
दिल्ली में अपने हक़ के लिए धरने में बैठे देश भर के किसान को कहाँ मालूम कि उनकी राहें कहाँ तक है उनके साथ आगे क्या होगा यह मौजूदा सरकार तय करेगी लेकिन किसानो को लेकर अधिकारियों और नेताओं के दोहरे रवैये देखने को मिल रहे है। सरकार एकतरफ़ कहती है किसान भाई उपार्जन बढ़ाये लेकिन जब किसान अब विकसित तकनीक अपनाकर खून पसीने से नहाकर अपनी फसल तैयार कर लेता है ,सरकार ख़रीदने से बच रही है।
दिल्ली दलाल और किसान
दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार हो या मध्यप्रदेश राजधानी भोपाल में बैठी किसान पुत्र शिवराज सरकार सभी दलालो और बिचौलिए ,व्यपारियो के लिए काम कर रही है क्योंकि अभी तक प्रदेश और जबलपुर जिले के अन्नदाता किसानो की धान खरीदी नहीं हो रही ,अधिकारी और सत्ता पक्ष के नेता का कहना है कि धान में नमी है इसलिए किसान नहीं आ रहे है किसान से पूछा तो मीडिया देखकर वे भी अब दूर भागने लगे है उन्हें मालुम है कि ये सरकार की गोदी मीडिया है ये किसानो के हक़ की बात नहीं करने वाली। इसलिए देश का किसान दिल्ली में बैठकर हड़ताल करने पर मज़बूर है।
लोकनीति की पड़ताल में
किसी गाँव में यदि 2500 किसान है तो अभी तक 25 किसान भी ऐसे नहीं मिले जिनके पास धान खरीदी का SMS आया हो ,कुलमिलाकर सरकार खुद ये चाहने में लगी है कि कम से कम धान पंजीयन में खरीदी करनी पड़े जिससे हमें बोझ कम रहेगा लेकिन किसानों के बोझ का क्या ??? किसानों को अब प्रदूषण फैलाने का आरोप भी लग रहा है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए जिस देश में न्यू ईयर सेलिब्रेशन में करोड़ो के फटाखे फोड़ दिए जाते है उस देश में अब किसानो को आप प्रदूषण फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। ख़ैर किसानों से ज्यादा प्रकृति की चिंता न अधिकारी करते है न हमारे नेता क्योंकि किसान वृक्षारोपण में फोटोशूट नहीं कराता न ही सोशल मीडिया में चिपकाता है।
मान लिया की पराली से धुँआ और प्रदूषण फैलता है

लेकिन क्या जबलपुर कलेक्टर ने ऐसी कोई योजना बनाई जिससे किसानो को गाँव -गाँव सम्बंधित अधिकारी पराली न जलाने और उसके फायदे नुक्सान की बात करने या उस पराली को गलाने वाले कैप्सूल और खाद में तैयार करने वाली विशेष बातों को लेकर किसानो के पास अधिकारी क्यों नहीं पहुँचे।यदि बात करते तो बीच का रास्ता निकाला जा सकता है लेकिन सरकारी नौकरशाह को अपनी बड़ी महंगी गाड़ियों से फुरसत नहीं मिलती कि वे एक ग़रीब किसानो के बीच जाए और उनसे बात करें। ये दोहरा रवैया नहीं तो क्या है ????
गांधीग्राम-राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 30 जबलपुर सिहोरा फोरलेन सड़क किनारे के खेतों में अभी भी पराली जलाने का भयानक रूप देखा जा सकता है, बुधवार को हाईवे के किनारे घाटसिमरिया के खेतों में पराली जलते हुए व पराली का चहुंओर,आसपास व आसमान में उड़ते धुएँ को देखकर बहुत से राहगीर रुक गए कि इतना भीषण धुंआ कहा से उठ रहा है, बाद में समझ आया कि पराली जल रही है।जिला प्रशासन द्वारा पराली और नरवाई जलाने के प्रतिबंधात्मक आदेश की बावजूद रबी फसल उत्पादित खेतों में धान कटाई एवं हार्वेस्टर से मिजाई उपरांत पैरा (पराली) को किसान खेतों में जला रहे हैं, जबकि इसके लिए शासन द्वारा प्रतिबंध लगाया जा चुका है। वर्तमान में गाँधीग्राम से जबलपुर की ओर हाईवे मार्ग के किनारे वा गाँधीग्राम से सिहोरा की ओर फोरलेन सड़क के किनारे खेतों को जलते हुए देखा जा सकता है, वहीं दूसरी ओर किसानों का मानना है कि खेतों के पैरा को जलाने से खेतों की सफाई होती है और अवशेष सड़कर खाद का काम करता है। जबकि खेतों में अवशेष जलाने से पूरे खेत में आग फैलने से मिश्रित किटाणु नष्ट हो जाते हैं। धुएं के कारण पर्यावरण भी दूषित होता है और पशु के चारा जलने से पशुओं के लिए पैरा महंगा हो जाता है।
खेतो में पराली जलाने को जुर्म बताया गया है,हाल ही में कलेक्टर द्वारा पराली जलाते पाए जाने पर कार्यवाही के निर्देश भी दिए हैं, परन्तु इस कानून का पालन करवाने में स्थानीय प्रशासन काफी लापरवाही करते हैं,वर्तमान में खेतों में लगी आग मुख्य सड़क से दिखती है बावजूद इस मार्ग से गुजरने वाले जनप्रतिनिधि , प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस कोई भी इस ओर ध्यान नहीं देते। इसे देख धीरे-धीरे अब लगभग सभी किसान पराली जलाने लगे हैं।क्षेत्र के बहुतायत रकबे में ग्रीष्मकालीन धान बोया गया है, जिसकी कटाई अभी अंतिम चरण में है । पशुओं के लिए पैरा,चारे का नुकसान–फसल काटने के तत्काल बाद खेतों में पैरा को जला दिया जा रहा है, इससे पर्यावरण और खेतों को नुकसान पहुँचाने के साथ साथ पशु चारे के लिए संकट पैदा हो रहा है,जानकारों का कहना है कि इसके बहुत से दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं, फिर भी किसान पैरा जला रहे हैं, जो चिंता का विषय है । किसान खेतों में पैरा न जलाकर उसका उचित प्रबंध कैसे करे, इस पर कृषि विभाग को भी ज्यादा से ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए । क्योंकि किसान जब रोटावेटर या हल से खेतों की जुताई करते हैं तो हार्वेस्टर से कटाई करने के कारण फसल अवशेष जुताई करने में बाधक बन जाते हैं। इसके उचित निपटान के अभाव में किसान उसे जला देते हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि किसान फसल अवशेष न जलाए और उसका उचित निपटान भी हो । लोगों का कहना है कि पूरे अंचल में पशुओं को सार्वजनिक रूप से रखा जा रहा है, जहां चारे के लिए पैरा की बहुत जरुरत रहती है । रबी फसल के पैरों को शासन स्तर पर ग्राम पंचायत के माध्यम से इन सेंटरों में मंगाया जा सकता है। इससे पलारी नहीं जलाना पड़ेगा और पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था में भी सहजता से हो जाएगी। इस ओर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ।
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