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लगातार सेवा देने, गुहार लगाने के बाद भी अतिथि विद्वानों की पीड़ा का शिवराज सरकार ने नहीं किया अन्त 

  • कई नव चयनित सहायक प्राध्यापको को बगैर अनुभव के परीवीक्षा अवधि में दे दिए आहरण एवं संवितरण के अधिकार 
  • कांग्रेस की 15 माह 6 दिन की सरकार में वर्तमान मुख्यमंत्री और भाजपा के कई बड़े नेताओं ने नियमितीकरण का किया था वादा

भोपाल : लगातार सेवा देने और गुहार लगाने के बाद भी प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत कार्यरत अतिथि विद्वान अपने भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। 15 माह 6 दिन की पूर्व कमलनाथ सरकार में वर्तमान मुख्यमंत्री और कई भाजपा के बड़े नेताओं ने भोपाल के शाहजहांनी पार्क में इनके आंदोलन स्थल पर जाकर कहा था कि हमें सत्ता मिलते ही हम फाॅलेन आउट अतिथि विद्वानों को तुरंत व्यवस्था में लेंगे और पहली ही कैबिनेट में निर्णय लेकर आप लोगों को नियमित कर देंगे। लेकिन अब भी 200 अतिथि विद्वान फाॅलेन आउट का दर्द झेल रहे हैं। 

वहीं हर जगह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. मोहन यादव से अपने नियमितीकरण के लिए अतिथि विद्वान मिलते हैं। परंतु उन्हें जवाब में आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला है। वहीं दो बार निरस्त हो चुकी और कई कोर्ट केस, दो से अधिक संतान, एक ही समय में अतिथि अनुभव लेना और नियमित डिग्री करना, दिव्यांग आरक्षण, फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाना आदि मामलो से घिरी सहायक प्राध्यापक भर्ती 2017, ग्रंथपाल और क्रीडा अधिकारी भर्ती 2018 से चयनितो को उच्च शिक्षा विभाग अब भी फायदा देने में पीछे नहीं हट रहा है। 

दरअसल शासकीय महाविद्यालय नलखेड़ा जिला आगर मालवा और शासकीय महाविद्यालय लटेरी जिला विदिशा में तो नव चयनित सहायक प्राध्यापकों को परिवीक्षा अवधि में ही साठगांठ और रसूखदारो की कृपा से आहरण एवं संवितरण के अधिकार देकर प्रभारी प्राचार्य तक बना दिया है। इसके अलावा प्रदेश के कई महाविद्यालयों में इन्हें बगैर अनुभव के प्रभारी अधिकारी भी बनाया गया हैं। जबकि इनकी बजाय अनुभवी सीनियर प्रोफेसर या नियमित प्राचार्य को यह दायित्व देना चाहिए।

मध्यप्रदेश अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी शंकरलाल खरवाडिया का इस संबंध में बताया कि, नियमित भर्ती कई मामलों से गिरी होने के कारण इसे निरस्त कर देना चाहिए और वर्षों से सेवा देने वाले अतिथि विद्वानों के लिए कोई ठोस नीति सरकार को तुरंत बनाना चाहिए। शासन की ही लापरवाही से अब तक 27 अतिथि विद्वान काल के गाल में समा चुके हैं। हाल ही में दिए नव चयनितो के दस्तावेजों की जांच के निर्देश भी केवल लिपा-पोती साबित हो जाएंगे। 

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