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उन्नाव केस में राजनेताओं की संवेदना या सत्ता के लिए दिखावा??

उन्नाव केस में राजनेताओं की संवेदना या सत्ता के लिए दिखावा??

उन्नाव जिले की दर्दनाक और दिल दहलाने वाली घटना से देश भर में मातम फैला हुआ है, बेशक देश के लिए आज का दिन काला दिवस साबित हुआ है.
पर देखने की बात तो ये है कि जब तक वो बच्ची ज़िंदा थी कोई उसके लिए आवाज़ उठाने तैयार नहीं था, जब वो ज़िन्दगी और मौत के लड़ रही थी तब सारे नेता चैन की सांस ले रहे थे. वो जब तक जीवित थी तब तक किसी ने उसके लिए आवाज नहीं उठाई आज वह मर गई है तो यह राजनेता कहीं आवाज उठाने का ढोंग तो नहीं कर रहे?                                                                                                           कांग्रेस पार्टी इस पूरे मामले में जहां योगी आदित्यनाथ की सरकार को घेर रही है, तो वही पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विधान भवन के बाहर बैठे हैं, तो मायावती भी योगी आदित्यनाथ की सरकार पर हमलावर है। 
उन्नाव की पीड़िता जिसका दूसरी बार रेप किया गया और दूसरी बार रेप करने के बाद उसे मार दिया गया।
वह अपने न्याय के लिए जब लड़ रही थी, अपने अधिकार के लिए लड़ रही थी, तब यह तमाम राजनीतिक पार्टियां शांत थी।
शायद राजनीति करने का बढ़िया अवसर प्राप्त नहीं हो पा रहा था। 
परंतु जब इस बिटिया की मौत की खबर इन्हें मिली तो धड़ाधड़ ट्वीट आना शुरू हो गए, धड़ाधड़ बयानबाजी आना शुरू हो गई और शुरू हो गया राजनीति का वह कलेवर जिस पर दिखाई देती है अवसरवादिता कि राह।
बच्ची के इंसाफ के लिए प्रखर होते इन राजनेताओं के बयानों को सुनिए, यह राजनेता आज आग बबूला हो रहे हैं शायद कल तक शांत थे। 
उन्नाव की पीड़िता अब अपने अंतहीन दर्द को महसूस करके मर चुकी है, वह मृत हो चुकी है, अब कोई नहीं बचा जो उसको इंसाफ दिला सके। 
तो यह राजनेता अब अपने बिलों (महलों) से निकल आए , यह बात उन्हें खराब भी लग सकती है और लगे भी क्यों ना आखिर समाज को वोट बैंक पॉलिटिक्स के ज़हर में उड़ेलने में इन्होंने भी बहुत मेहनत करी है और आज भले ही ये न्याय की बात करते रहे, लेकिन जनता इनकी बातों में कतई नहीं आने वाली।
क्योंकि हमने देखा है जब नेता आरोपी होता है तो यहीं नेता किस तरह से उसका बचाव करते हैं।
वर्तमान में एक रिपोर्ट भी सामने आई है जिसके अनुसार संसद में बैठने वाले सांसद भी दागी है और इसमें सबसे आगे देश की वह दो प्रमुख पार्टियां हैं जिसके नेता सरकार बनाते हैं अथवा विपक्ष में बैठते हैं। जी हां हम बात कांग्रेस व भाजपा की ही कर रहे हैं।

बहरहाल इस तरह के मामलों में किसको क्या भूमिका तय करनी है , किसको क्या करना है, या समाज किस तरह से बदलेगा या राजनीतिक पार्टियों की क्या भूमिका होनी चाहिए।  इस पर विस्तृत चर्चा करने के लिए ना तो ज्यादा समय है और ना ही इस तरह के विषय को समझने के लिए हमें कोई विद्वता या विशेषज्ञ का दिमाग चाहिए।
यह एक साधारण सी बात है जो आज तक लोगों के समझ में सही तरीके से आ नहीं पा रही है सिर्फ प्रदेश और जिला और तालुका के नाम बदलते जा रहे हैं, घटना नहीं। 

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