मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार से किया तल्ख सवाल वार्ड के आरक्षण में राजनीतिक दबाव क्यों?

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार से किया तल्ख सवाल वार्ड के आरक्षण में राजनीतिक दबाव क्यों?
- वार्ड को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया जाना विधिसम्मत था, तो फिर उसे निरस्त क्यों किया गया?
- प्रमुख सचिव से स्पष्टीकरण तलब
द लोकनीति डेस्क जबलपुर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने नगरीय निकाय के वार्ड आरक्षण में राजनीतिक दबाव को लेकर नाराजगी जताई। इसी के साथ प्रमुख सचिव से स्पष्टीकरण तलब कर लिया। वार्ड का पूर्व आरक्षण निरस्त किए जाने के रवैये को याचिका के जरिये चुनौती दी गई है। इस सिलसिले में राज्य शासन, प्रमुख सचिव व आयुक्त नगरीय प्रशासन, कलेक्टरव अपर कलेक्टर, दमोह व मुख्य नगर पालिका परिषद अधिकारी, दमोह को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में जवाब मांगा गया है।
न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता दमोह निवासी विवेक कुमार की ओर से अधिवक्ता भूपेंद्र कुमार शुक्ला ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि नगर पालिका, दमोह अंतर्गत दमयंती बाई वार्ड पूर्व में विधिसम्मत आरक्षण के माध्यम से अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिए आरक्षित कर दिया गया था। इसके बवजूद नए सिरे से आरक्षण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इसी रवैये को याचिका के जरिये चुनौती दी गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बार नियमानुसार हो चुके आरक्षण को नए सिरे से किया जाना अनुचित है। यह एक तरह की मनमानी है। इससे नियम-कायदों की धज्जियां उड़ती हैं। साफ है कि पर्दे के पीछे राजनीतिक दबाव कार्य कर रहा है। वार्ड को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया जाना विधिसम्मत था, तो फिर उसे निरस्त क्यों किया गया? इसी सवाल का जवाब हाई कोर्ट को नगरीय प्रशासन विभाग सहित अन्य अनावेदकों से पूछना है।

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