जबलपुर : भाई के गुज़र जाने पर बहन ने दिया अर्थी को कंधा और किया अंतिम संस्कार , जिसने भी देखा वही रोने लगा

जबलपुर : भाई के गुज़र जाने पर बहन ने दिया अर्थी को कंधा और किया अंतिम संस्कार , जिसने भी देखा वही रोने लगा
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जिस भाई के हाथों में बाँधी राखी ,आज उसी के कंधे पर जब भाई की अर्थी निकली
- आज जबलपुर में जिसने भी यह द्रश्य देखा वह भी अपने आप को रोने से नहीं रोक पाया
- भाई के वियोग से दुखी बहन ने बताया कि मां तो बचपन में ही साथ छोड़कर भगवान के पास चली गई
- पापा कुछ दिन ही पहले शांत हो चुके हैं और आज मेरा प्यारा भाई मुझे अकेला छोड़ गया,मैं तो अनाथ हो गई….
द लोकनीति डेस्क जबलपुर
रक्षाबंधन हम सभी जानते है भाई -बहन का त्यौहार होता है। जिसमे बहन भाई की कलाईयों में राखी बाँध कर एकदूसरे की रक्षा की मनोकामना करते है। लेकिन सोचिये जिन हाथों से भाई के हाँथो पर राखी बाँधी गई हो आज उसी भाई को अपने हाथों से मुखाग्नि (आग ) दी जाने वाली हो ,ऐसे द्रश्य को जिसने भी देखा वह आपने आँसू नहीं रोक सका। स्थानीय लोगों ने बताया कि उनके घर में माँ -बाप का साया उठ जाने के बाद अब बहन ही बची है। यह मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले का मामला है।
ये है पूरा मामला। …

जबलपुर : जिस भाई के हाथ में वह राखी बांधती थी उसी के कंधे पर आज जब भाई की अर्थी निकली तो जिसने भी देखा वह भी रो उठा। यह नजारा आज सुबहरानीताल मुक्तिधाम में देखने को मिला। यहां अंतिम संस्कार के लिए आए हर व्यक्ति की आंखें द्रवित थीं। लोगों की जुबान पर सिर्फ एक ही बात थी कि दुनिया में कितना गम है। वे कह रहे थे कि भगवान ऐसा दिन किसी को ना दिखाएं ।दुखी बहिन ने परोपकारी संस्था गरीब नवाज कमेटी के सहयोग से भाई को मुखाग्नि भी दी।
भाई के वियोग से दुखी बहन ने बताया कि मां तो बचपन में ही साथ छोड़कर भगवान के पास चली गई । पापा भी कुछ दिन पहले ही शांत हो चुके हैं और आज मेरा प्यारा भाई भी मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गया। भाई के निधन से मैं तो अनाथ हो गई। अब मैं किसके सहारे जिगी यह कहते उसकी आंखों से झरझर आंस बहने लगे। कई वर्षों पहले सुरेश विश्वकर्मा अपने दो बच्चों अजय एवं दुर्गा के साथ इमलिया मोड़ के पास स्थित एक छोटे से गांव से जीवन यापन के लिए शहर आया था। शहर में जो काम मिलता वह करते हैं । रात को रोड किनारे ही अपने दोनों बच्चों के साथ सो जाता था । कई सालों से पिता पुत्र एवं पुत्री को रानीताल चौक स्थित हनुमान मंदिर के रहे थे। उसके बाद से हम भाई-बाहन ही एक दूसरे का सहारा पास ही देखा जाता था । वह कभी फूल माला बेच कर तो थे आज मेरे भाई अजय विश्वकर्मा 24 वर्ष की उम्र के बाद मुझे अकेला अनाथ छोड़ गया अब मैं किसके सहारे जीने वाली हूँ ।
गरीब नवाज कमेटी ने कराया हिन्दू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार
कभी मजदूरी करके या मंदिर में आने वाले दानवीरों से बीमारी के चलते मौत हो गई अब मेरा इस दुनिया में कोई जो मिल जाता उसके सहारे अपना जीवन चला रहा था। नहीं बचा। इतनी छोटी सी उम्र में परिवार के सभी लोगों मंदिर के पास ही रोड रोड किनारे एक छोटी सी झोपड़ी का साथ छोड़ के चले जाने से व्याकुल दुर्गा ने कहा कि अब बनाकर पिता पुत्र एवं पुत्री जैसे तैसे अपना जीवन बिता रहे मैं वापस अपने गांव चली जाउंगी। वहां वह मामा मामी थे। लेकिन भाई ,बहन को क्या मालूम था कि मां के जाने के साथ ही रहेगी गरीब नवाज कमेटी के अध्यक्ष इनायत के बाद पिता भी उनका साथ छोड़ देंगे। बेटी दुर्गा विश्वकर्मा अली और उसके टीम ने अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाज उम्र 17 वर्ष ने बताया कि पिता की मृत्यु कुछ महीने पहले से कराया गरीब नवाज कमेटी ने दुर्गा विश्वकर्मा के ही इलाज के दौरान हो गई थी वह कई दिनों से बीमार चल पिता का भी अंतिम संस्कार कराया था ।


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