प्रिया शरण, भोपाल। लैंगिक असमानता के बारे में कई बहस और इसे रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बावजूद, महिलाओं को घर में असमानता का सामना करना पड़ता है, खासकर घरेलू कामों में। हालांकि पहले के मुकाबले महिलाओं की कार्य क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है, वे सभी क्षेत्रों में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान दे रही हैं पर सही मायने में समानता प्राप्त करने के उनके संघर्ष का रास्ता अब भी काफी लंबा है।
कैम-चैंप ( chem- champ ), भोपाल के करोंद स्थित केमिस्ट्री कोचिंग क्लासेस की टीचर श्रीमती श्यामली जोशी जो पेशे से रसायन विज्ञान की अध्यापिका हैं। वे अपने अनुभवों को साझा करते हुए हमें बतातीं हैं कि भले ही आज के दौर में शिक्षित और नियोजित महिलाओं की संख्या बढ़ रही है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों में उनकी भागीदारी कम हो रही है। कामकाजी महिलाएं भले ही अपने कार्यालयों में अधिक से अधिक समय बिताती हों, लेकिन उनका काम यहीं पर खत्म नहीं होता उन्हें घर जाके भी अपने पति या परिवार के अन्य पुरुषों की तुलना में बच्चों की देखभाल या घर के कामों में अधिक समय देना पड़ता है और रात में सभी कामों को पूरा करके ही वे सो पातीं हैं ताकि अगले दिन वे समय से क्लास्से जा सकें।
वे आगे कहती हैं कि जब मैं अपने तीन दशकों से अधिक के करियर के बारे में सोचती हूं ,एक कैमिस्ट्री टीचर के तौर पे, एक माँ, और एक गृहिणी के रूप में मुझे वे सभी सुबह 5 बजे उठाने वाले अलार्म, खाना बनाने कि जल्दी, अपने पति और बेटे के लिए लंच बॉक्स पैक करना, ससुर जी की दवाइयां दे कर सुबह 8 बजे स्कूल समय से पहुंचने के लिए दौड़ना । फिर दिन में 3 बजे से कोचिंग में पढ़ाना और रात 8-8:30 बजे कोचिंग से लौटने के बाद सीधे किचन में चले जाना ये सब मेरे ज़हन में आजाता है।
मेरी तरहा अधिकतर सभी काम काजी महिलाओं की दिनचर्या कुछ इसी प्रकार होती होगी , और इसी तरह की जद्दोजहद भरी दिनचर्या में अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए कई बार वे हताश हो कर मानसिक तनाव से भी ग्रस्त हो जाती हैं और स्वयं के स्वास्थ्य पर भी सही से ध्यान नहीं दे पातीं।
एक थर्ड पार्टी सर्वे की मानें तो लगभग 77 प्रतिशत महिलाओं ने महसूस किया है कि उनके पति जो काम करते हैं, उसी के अनुरूप पत्नी को अपना शेड्यूल बदलना पड़ता है। इस तरह का परिदृश्य कई बड़े सवाल खड़े करता है कि केवल महिलाओं को ही क्यों अपने पति के कार्यचर्या में फिट होने के लिए, अपने समय से समझौता करने के लिए कहा जाता है ? क्या उनका समय समान रूप से मूल्यवान नहीं है?
आज दुनिया में महिलाओं की आबादी 3.905 बिलियन आंकी जाती है, जो कि 49.58% वयस्क महिलाओं की आबादी को दर्शाती है जो श्रम शक्ति का हिस्सा हैं। पिछले कुछ दशकों में समय में काफी बदलाव हुए है, कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है और लिंग अंतर को कम कर रही है। सभी विषमताओं के बावजूद महिलाएं पहले से कही अधिक सभी कार्य क्षेत्रों में बढ़ रही हैं।
श्यामली जी आगे कहती हैं, जहॉं महिलाएं आज पराधीन होने से लेकर स्वावलम्बी नारी बनने तक, दबने से नेता बनने तक, वशीभूत होने से ऊँची उड़ान भरने तक का सफर तय कर चुकी हैं वहीं यह सफर बहुत कठिनाइयों भरा रहा है। वे कहती हैं कि मैंने कई प्रगतिशील लोगों तक को ऐसी बात करते हुए सुना है कि मैं अपनी पत्नी को काम करने दे रहा हूं, मैं अपनी बेटी को काम करने की इजाज़त दे रहा हूं। अब यहां समझने वाली बात यह है कि (couple) दंपती यानी परिवार के दो मुखिया। दोनों को अपना व्यक्तिगत निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए, ऐसा कुछ नहीं है कि कोई आपको अनुमति दे रहा है या फिर कोई अनुमति नहीं दे रहा है। आप अपने लिए स्वयं निर्णय ले। यह आपका अधिकार है इस बात को समझें, आपका करियर आपकी पसंद है इसे किसी को भी नियंत्रित ना करने दें। यह सब मेरे लिए भी बहुत मुश्किल था पर मैंने चीजें और टाइम मैनेज करना सीखा , और मैं सभी को यही कहुंगी की स्वयं निर्णय लें, शांत होकर सोचें कि आप अपने करियर को कैसे मैनेज करेंगी, बस किसी के दबाव में आकर कभी अपने सपनों और करियर को दरकिनार ना करें।
अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में समान कार्य के लिए महिलाओं को उनके पुरुष सहकर्मी की तुलना में केवल 65% भुगतान किया जाता है। इससे महिलाओं का उत्साह कम हो जाता है क्योंकि उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता, उन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है जिससे उनका उत्साह और मनोबल कम हो जाता है । इस लिए हमें इस पिछड़ी सोच को बदलना होगा और हमें एक बहुत अच्छा संतुलन बनाना होगा क्योंकि महिलाएं अधिक सक्षम, अधिक उत्साही, अधिक काम करने वाली होती हैं और उन्हें अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए न कि हतोत्साहित ।
पुरुषों में अक्सर देखा गया है कि जब वे अकेले रहते हैं तो उनके पास दैनिक कामकाज करने की क्षमता और इच्छाशक्ति होती है, लेकिन जिस क्षण उन्हें घर में एक महिला की उपस्थिति महसूस होती है, उनमें से अधिकांश आलस्य में लिप्त होकर उम्मीद करते हैं कि वह उन्हें और घर को संभाल लेगी। और ठीक यही समस्या है कि वर्तमान पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में, पुरुष आमतौर पर सोचते हैं कि घर का काम महिलाओं का कर्तव्य है और उन्हें इसे अच्छी तरह से करना चाहिए और इसी घरेलू श्रम का असामान्य विभाजन महिलाओं में चिंता, मनोबल का गिरना, निराशा अवसाद और तनाव जैसी भावनाओं को जन्म देता है जिस कारण आगे चलकर वैवाहिक संबंधों में तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।
कुछ तरीके जिनसे हम वर्क टाइम मैनेजमेंट की मदद से घर के कामों का भार कम कर सकते हैं :
1. काम का समान वितरण :
जब दोनों पति-पत्नी काम कर रहे हों तो घरेलू काम का समान वितरण होना चाहिए। सबको पता होना चाहिए कि रसोई में कैसे काम करना है, हर किसी को पता होना चाहिए कि घर के अन्य कामों को कैसे संभालना है और एक व्यक्ति पर सारा बोझ नहीं डालना है।
2. ज़रूरत महसूस होने पर मदद लें :
अधिक बोझ या थकान महसूस होने पर आपको अपनी बात परिवार के समक्ष रखनी चाहिए, आपको कुछ मदद जरूर लेनी चाहिए और वह मदद आपके तनाव और उसके कारण को काफी हद तक कम करने में मदद करेगी।
3. मजबूत उदाहरण सेट करें :
एक माँ के रूप में, सुनिश्चित करें कि आप परिवार के सभी सदस्यों को कार्य सौंपे, एक पिता के रूप में सुनिश्चित करें कि आप कामों में मदद करें। वास्तव में, पुरुषों को किचन में जाकर खाना बनाने या साफ-सफाई या झाडू लगाने में शर्म नहीं करनी चाहिए। यह सब काम एक खूबसूरत काम है।
4. तुलनात्मक सोच ना रखें :
जब दोनों काम कर रहे हों तो उन्हें अच्छी तरह पता होना चाहिए कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। आप अधिक वेतन कमा रहे हैं तो आपकी नौकरी बेहतर है और कोई कम कमा रहा है तो उसकी खराब, इस तरह की तुलना ना करें। काम काम है। सभी कार्यों को समान रूप से बांटे और आप अपने साथी के भी कार्य का पूरा सम्मान करें।