इंदौर : "रेमडेसिविर इंजेक्शन" ने रुलाया, स्टाॅक खत्म, ब्लैक में भी लेने को मजबूर परिजन, तड़पती धूप में घंटो खड़े रहे लाइन में.... 

इंदौर : "रेमडेसिविर इंजेक्शन" ने रुलाया, स्टाॅक खत्म, ब्लैक में भी लेने को मजबूर परिजन, तड़पती धूप में घंटो खड़े रहे लाइन में.... 

मध्यप्रदेश/इंदौर - मध्यप्रदेश के इंदौर में कोरोना बेकाबू होता जा रहा हैं। यहां आए दिन रिकॉर्ड तोड़ मामले सामने आ रहे हैं। हालात ये है कि अस्पतालों में  बेड की किल्लत शुरू हो गई हैं। इतना ही नहीं इन सबके बीच अब रेमडेसिविर के इंजेक्शन के लिए भी हाहाकार मच रहा हैं। दुकान पर लिखा है 'रेमडेसिविर इंजेक्शन का स्टाॅक नहीं है। आने पर सबको दवाई मिलेगी। हालात यह है कि इंदौर के अलावा उज्जैन संभाग से लेकर भोपाल तक के लोग यहां इंजेक्शन की खोज में भटक रहे हैं।

हालात ये है कि एक इंजेक्शन के लिए लोग सुबह से ही लाइन में लग रहे हैं। लोग अपने किसी ना किसी रिश्तेदार को महामारी से बचाने के लिए घंटों धूप में तप रहा हैं। भीड़ इतनी कि धक्का-मुक्की की स्थिति बन रही हैं। पुलिस तक को आकर स्थिति को संभालना पड़ रहा हैं। 

दरअसल, फरवरी-मार्च के दौरान रेमडेसिविर की मांग कम थी। इसकी एक्सपायरी डेट पास आने पर कंपनियों ने इसकी कीमत कम कर इसे स्टॉकिस्ट के पास डंप कर दिया था, लेकिन अब इसी पर जमकर मुनाफा वसूली हो रही है और कालाबाजारी की जा रही हैं। 15 दिन में इसकी मांग एक-डेढ़ हजार प्रतिदिन से बढ़कर 6 हजार हो गई हैं। 

इंदौर में 25 स्टॉकिस्ट हैं और उन्होंने साफ कर दिया कि कंपनी जितना भेज रही, उतना सप्लाय कर रहे हैं। देखने में आया है कि दस फीसदी से कम लंग्स संक्रमण वाले, होम आइसोलेशन में रहने वाले कम गंभीर मरीजों को भी यह इंजेक्शन लग रहे हैं। इसके चलते हर दिन की मांग छह हजार इंजेक्शन तक पहुंच गई है, जबकि आपूर्ति तीन हजार इंजेक्शन प्रतिदिन की हैं। केंद्र की गाइडलाइन के तहत इंजेक्शन केवल गंभीर मरीजों तक ही पहुंचे, इसकी कोई व्यवस्था प्रशासन के पास नहीं है। इसके चलते हालात बेकाबू हो रहे हैं और इसके लिए लोग दुकानों के बाहर सुबह से ही इंतजार कर रहे हैं।

लोगों की आपबीती 

रेमडेसिविर की तलाश में भटक रहे परेश ने बताया कि सुबह 8 बजे आ गया था। वे कह रहे हैं कि उनके पास स्टॉक नहीं हैं। कल आया, तो दोपहर 4 बजे आने को कहा था। हालांकि इंजेक्शन नहीं मिला। बहुत से लोग थे, जिन्हें वापस जाना पड़ा था। 90 साल के दादा जी तीन दिन से भर्ती हैं। उन्हें 2 इंजेक्शन लग चुके हैं। हर दिन का 12 हजार रुपए लग रहा है। ये कह रहे हैं कि शाम 6 बजे स्टॉक आएगा। पहले जो इंजेक्शन लिए थे, वे दो-दो हजार के पड़े थे।

वहीं, एक अन्य व्यक्ति पृथ्वीराज ने बताया रेमडेसिविर इंजेक्शन नहीं मिल रहा। कल आया था, तो कहा कि नहीं हैं। सुबह 8 बजे से खड़ा हूं। अब कह रहे हैं कि शाम को मिलेगा। हमने पहले अपने मरीज को ब्लैक में इंजेक्शन लेकर लगवाया था। एक इंजेक्शन 6000 रुपए का पड़ा था। जान बचाना था, इसलिए हमें इंजेक्शन लिया। मेरे पेशेंट तीन दिन से भर्ती हैं। अभी तीन दिन में एक लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। सबसे बड़ी समस्या है कि मेडिक्लेम भी चल नहीं पा रहा। पहले बेड के लिए भटके, अब इंजेक्शन के लिए भटक रहे हैं।

गौरतलब है कि कोरोना से निपटने के लिए अब अस्पतालों में बेड से ज्यादा चुनौती मरीजों को ऑक्सीजन और रेमडेसिविर इंजेक्शन की आपूर्ति की बन गई हैं। इन दोनों के इंतजाम में शासन-प्रशासन का दम फूलने लगा हैं।