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GST काउंसिल की बैठक में बड़ा फैसला, राज्यों को आज रात ही मिलेंगे 20,000 करोड़ रुपए

नई दिल्‍ली / भारती चनपुरिया : – वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद ने काेरोना के कारण राजस्व संग्रह में कमी आने से राज्यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की भरपाई के लिए जुलाई 2022 के बाद भी जीएसटी क्षतिपूर्ति को लागू रखने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही इस मद में चालू वित्त वर्ष में अब तक जमा 20 हजार करोड़ रुपये को आज ही रात में राज्यों को हस्तातंरित करने का भी फैसला लिया गया है।

    गुड्स एंड सर्विस टैक्‍स काउंसिल  की बैठक में वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने राज्‍यों के हित में एक बड़ा फैसला लिया. निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस साल 20,000 करोड़ रुपये का जीएसटी कॉम्‍पनशेसन सेस है. उन्‍होंने कहा, 'जीएसटी काउंसिल ने फैसला किया है कि जून, 2022 के बाद क्षतिपूर्ति सेस को आगे बढ़ाया जाएगा.' बैठक में छोटे टैक्सपेयर्स को राहत दी गई है. काउंसिल ने फैसला किया है कि छोटे टैक्सपेयर्स को तिमाही आधार पर रिटर्न दिया जाएगा.

अब 12 अक्टूबर को परिषद की होगी  बैठक : –

  उन्होंने कहा कि जीएसटी संविधान संशोधन में राज्यों को क्षतिपूर्ति देने का प्रावधान है और इससे केन्द्र कभी भी नहीं मुकरा है। राज्यों को क्षतिपूर्ति राशि दी जायेगी। अब 12 अक्टूबर को होने वाली बैठक में इस संबंध में विस्तार से चर्चा के बाद निर्णय लिये जायेंगे। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने बाजार से राशि जुटाने का विकल्प नहीं चुना है उनके लिए भी व्यवस्था की जायेगी और अगली बैठक में इस पर निर्णय लिया जायेगा।

GST  कलेक्शन में 2.35 लाख करोड़ की है कमी : –

रेवेन्यू सेक्रेटरी अजय भूषण पांडे ने कहा कि अभी जीएसटी कलेक्शन में 2.35 लाख करोड़ रुपये की कमी है. इनमें से 97,000 करोड़ रुपये जीएसटी का बकाया है, जबकि बाकी कोरोना वायरस की वजह से बाकी है. अगस्त 2020 में हुई काउंसिल की बैठक में केंद्र ने जीएसटी की भरपाई के लिए दो विकल्प सुझाए थे. एक, राज्यों को एक स्पेशल विंडो मुहैया कराई जाएगी, जिसके तहत वे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से लोन ले सकते हैं. इसमें कम ब्याज दर पर राज्यों को 97,000 करोड़ रुपये का कर्ज मिल सकता है. इस रकम को 2022 तक सेस कलेक्शन से जमा किया जा सकता है.

उल्लेखनीय है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थित राज्यों की सरकारों ने बाजार से राशि जुटाने के विकल्प का चयन किया है जबकि कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों ने इस विकल्प को नहीं चुना है और केन्द्र पर दबाव बना रहे हैं कि वह धनराशि जुटाकर उन्हें दे।

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