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अल्प मानदेय में अतिथि विद्वानों ने वर्षो से पढ़ाया और फायदा ले गए दूसरे उम्मीदवार! कब मांगे पूरी करेगी सरकार? 

अल्प मानदेय में अतिथि विद्वानों ने वर्षो से पढ़ाया और फायदा ले गए दूसरे उम्मीदवार! कब मांगे पूरी करेगी सरकार? 

600 से अधिक अतिथिविद्वान अभी भी फालेन आउट 

भोपाल:- एमपी पीएससी से हुई 400 अंको की सहायक प्राध्यापक, ग्रंथपाल और क्रीड़ा अधिकारी की भर्ती में 15 से 20 वर्ष या उससे भी अधिक समय से पढ़ाने वाले अतिथि विद्वानों को भी 5 प्रतिशत बोनस अंक और उम्र में छूट का लाभ दिया गया था। जिसने केवल 5 वर्ष पढा़या वह भी 20 वर्ष तक पढा़ने वाले के समान था। इसमें अन्य राज्य के उम्मीदवार और नए उम्मीदवार सबसे अधिक सीट ले गए थे। अन्य राज्य के उम्मीदवारो के लिए निर्धारित कोटा और उम्र का बंधन नहीं था। जबकि राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात आदि राज्यों में इस प्रकार का बंधन है। 4000 से अधिक पदों की भर्ती में मात्र 756 शासकीय और जनभागीदारी के अतिथि विद्वान चयनित हुए थे। उसमें भी एसी, एसटी और ओबीसी कोटे की कुछ सीटो पर कुछ विषयों में पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिलने से बिना अनुभवधारी का भी न्यूनतम अंक अर्जित करने पर चयन होना तय था।

उच्च शिक्षा विभाग में सभी वर्गो के लिए कई वर्षो बाद हुई इस भर्ती ने अतिथि विद्वानों का जीवन खराब कर दिया है। इनको पूर्व कमलनाथ सरकार वचन देकर भी नियमित नहीं कर पाई थी और न ही उस दौरान विपक्ष में रहकर इनकी भलाई का गीत गाने वाली वर्तमान भाजपा सरकार अब कुछ कर रही है ।वर्तमान में कार्यरत और फाॅलेन आउट अतिथि विद्वानों की संख्या 4200 से अधिक है। जिसमें कई योग्य लोग समय पर भर्ती नहीं होने और इससे पूर्व हुई बैकलाॅक भर्तियों में उन्हें उचित लाभ नहीं मिलने के कारण अब भी दर दर भटकने पर मजबूर हैं।

वहीं 600 से अधिक फाॅलेन आउट अभी भी पूर्व कमलनाथ सरकार से बेरोजगारी का जहर पीते आए हैं। व्यवस्था में आने और नियमितीकरण के इंतज़ार में अब तक 11 अतिथि विद्वान स्वर्ग सिधार गए हैं। इनकी मांग का पूरजोर पक्ष लेने वाली वर्तमान शिवराज सरकार और राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अब चुप्पी साध रखी है। जबकि इन्होने सड़क से लेकर सत्ता तक इनकी न्यायसंगत मांग के लिए आवाज़ उठाई थी। अगर देखा जाए तो अतिथि विद्वानों ने कांग्रेस और भाजपा सरकार दोनों में ही अल्प मानदेय में प्रदेश के दूरदराज के महाविद्यालयों में जाकर कालखंड दरों पर सेवाएं दी है। कई राज्यों ने इस प्रकार की व्यवस्था में सेवा देने वाले को नियमित भी किया है।

 मध्यप्रदेश में इनके हाल बुरे हैं।  यदि सरकार चाहे तो पूर्व में हुई आपाती, तदर्थ, बैकलॉक भर्ती 2003 और अन्य राज्य की नियमितीकरण की पॉलिसी का अध्ययन करवाकर इन्हें भी नियमित कर सकती है। लेकिन इन उच्च शिक्षितो की ओर वर्षों से बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। वर्तमान सीएम शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के तमाम मंत्रियों से हर जगह अतिथि विद्वान अपनी  सेवा बहाली और नियमितीकरण की मांग के लिए मिलते हैं। परंतु उन्हें झूठ का झुनझुना पकड़ा दिया जाता है। इस तरह इनके भविष्य के साथ अन्याय किया जा रहा है। आखिर कब तक इन उच्च शिक्षित लोगों के साथ अन्याय होता रहेगा।

 अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी  ने इस बारे में बताया है कि, नियमित भर्ती और अतिथि विद्वानों की भर्ती दोनों में ही हम उच्च योग्यताधारियों के साथ धोखा हुआ है। यदि नियमित भर्ती की किसी स्वतंत्र एजेंसी से परीक्षण करवाया जाए तो इसमें से भ्रष्टाचार खुद ब खुद बाहर आ जाएगा। इस भर्ती ने अतिथि विद्वानों का हक मारा है। बड़े-बडे़ रसूखदारो और अधिकारियों का भी इसमें हस्तक्षेप है। जिसके कारण पूर्व कमलनाथ सरकार ने नियुक्ति देने में जल्दबाजी दिखाई थी। अब यदि शिवराज सरकार हमारा भला चाहती है तो उचित निर्णय लेने में देर नहीं करना चाहिए। अन्यथा आगामी दिनों में फिर शाहजहांनी पार्क भोपाल जैसा आंदोलन देखने को मिलेगा।

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