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जब तक प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होगी सुविधाएं, तबतक शासन की मंशा अनुरूप आत्मनिर्भरता की बात अधूरी 

जब तक प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होगी सुविधाएं, तबतक शासन की मंशा अनुरूप आत्मनिर्भरता की बात अधूरी 

प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्तियों को मिलना चाहिए फैसिलिटी सेंटर की सुविधाएं व लाभ तभी फैसिलिटी सेन्टर का पवित्र उद्देश्य पूरा होगा।

प्रशिक्षण प्राप्त आदिवासी युवाओ व उनके परिवारों को भी होगा स्वरोजगार प्राप्त 

नहीं करना पड़ेगा ग्रामीणों को मजदूरी के लिए अन्य स्थानो पर पलायन 

धार : – बाघ प्रिंट  प्रोजेक्ट को विकसित करने के लिए शासन स्तर पर कई कार्यक्रम व कार्यशालाएं आयोजित कर कई व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया था. जो बाद मे पुश्तैनी  रगरेंज शिल्पकारों के यहां कार्य कर रहे हैं 
इन पुश्तैनी रंगरेंज शिल्पकारों के यहा सम्पूर्ण कार्य,इस क्षेत्र का आदिवासी कलाकार ही कार्य करता है।
म. प्र. हस्त शिल्प निगम,हाथ करघा,जिला पंचायत या अन्य विभागों ने इस हस्त शिल्प कला को,क्षेत्र के आदिवासीयों को रोजगार से जोड़ने के लिये, वर्ष 1985 से तत्कालीन कलेक्टर सुनीलकुमार के समय से अब तक अनेकानेक ट्रेनिंग,प्रशिक्षण करवाये है, उन्हें प्रशिक्षित कर व अनुदान पर रोजगार से जोड़ने साम्रगीयाँ भी दी गई।
परन्तु पुश्तैनी रंगरेजों ने इन प्रशिक्षु आदिवासी कलाकारों को आज तक आगे नही बढ़ने दिया।ये आदिवासी कलाकार व्यवस्थाओं एवं शासन तथा अपने व्यवसाय के बिक्री मे अपनें हुनर के अभाव मे पिछड़ते रहें।मजबूरन इन रंगरेजों के यहां ही,इन्हें सुनियोजित तरीकों से कारीगर मजदूर बनाकर ही रख लिया गया।
1985 से 1990 के बीच कार्यरत तत्कालीन कलेक्टरों ने भी इस हस्तशिल्प को बढ़ावा देनें का उद्देश्य कुटीर उघोग के रुप मे करनें के भरसक प्रयास मे,हस्तशिल्पनिगम  का एक प्रशिक्षण व सहसंग्रहण केन्द्र भी,वर्तमान मे लग रहे टप्पा तहसील कार्यालय पर खोला गया था।परन्तु पुश्तैनी रंगरेजों को लगा कि यह व्यापार,यह कला हमारे हाथों से निकलकर,इस व्यवसाय का विकेन्द्रीकरण हो जावेंगा।बाग प्रिंट के नाम जो मनमानी किमते ली जा रही है,इसमें प्रतिस्पर्धा आ जावेगी,और यह पुश्तैनी रंगरेंज का व्यवसाय आम होने से,खास बने रहने से वंचित रह जावेगा।इसी द्दष्टिकोण से,इन पुश्तैनी रंगरेजों की कुटिल नीति के चलतें,यह व्यवसाय,प्रशिक्षण से प्रशिक्षित आदिवासियों व महिलाओं के लिये उपयोगी नही बन पा रहा है।
यही कारण है कि,इसका पूरा पूरा लाभ शासन-प्रशासन से समस्त उपलब्ध सुविधाओं व योजनाओं का लाभ बाग हो या कुक्षी डही व इन्दौर सभी दुर पुश्तैनी रंगरेंज ही लाभ उठा रहे है।और उसमे भी बाग के सम्पन्न,धनाढ्य, व तिकडमबाज,पुरस्कारों के दम पर,कुक्षी,डही व इन्दौर के रंगरेज उपेक्षित हो रहें है।जबकि वहा पर भी बाग जैसी ही प्रिंट हो रही है,परन्तु निगम इन्हें सहयोग नही दे रहा है।वहीं इनका दुर्भाग्य यह है कि,वे बाग छोड, अपनी व्यवस्थाओं अनुसार अपने ही गाँव व नगर मे कार्य कर रहे है।इसलिये प्रशासन को बाग के अलावा अन्य क्षेत्र नजर नही आ रहा है,और न ही इन्हें प्रतिस्पर्धा मे लानें,इन्हें मार्गदर्शन के रुप मे प्रशासन,निगम या हाथ करघा बढ़ावा दे रहा है।
इन पुश्तैनी रंगरेजों के मकड़जाल को तोड़ने के लिये वर्ष 2000 के आसपास तत्कालीन जिला पंचायत C.E.O. जिले मे कम्प्यूटर युग से कार्य की शुरुआत करनें वालें कम्प्यूटर के मास्टरमाइंड अमित अग्रवाल ने भी भरसक प्रयास कर,इस व्यवसाय को,शिक्षित आदिवासी– हरिजन यूवाओं को व्यवसाय से जोड़ने के सार्थक प्रयासों ने सफलता प्राप्त की थी।एक शिक्षित अनुसूचित जाति के होनहार  यूवा अमरसिंह को उन्होंने उसके व्यापार को बढ़ावा देने उसे शासन-प्रशासन के सहयोग से कई मर्तबा विदेशों मे भी व्यापार के लिये भेजा,ओर धार तथा माण्डू मे उसे बागप्रिंट के बने मटेरियल को बाजार देने के उद्देश्यों के लिये शोरूम बनाकर, व्यापार को रोजगार से जोड़ने का सार्थक प्रयास भी किया था।
परन्तु अग्रवाल के छत्तीसगढ़ राज्य मे चलें जाने से,बाग मे अनुसुचित जाति व जनजाति से जुड़ रहे इस व्यवसाय पर पुश्तैनी रंगरेजों ने तुषारापात–कुठाराघात करना शुरु कर दिया,उनके यहा के कुशल कारीगरों को कुटिल नीति के तहत तोड़कर,अपनी कार्यशाला मे,अग्रिम धनराशि पर जोड़ने से,यह व्यवसाय अनुसूचित जाति व जनजाति व्यक्तिओं को मालिक से मजदूर बनने को मजबूर होना पड़ा?
इसतरह क्यों मजदूर हुएँ, कैसे बनें,इस पर कोई रिसर्च नही किया गया,और यह व्यवसाय पुश्तैनी हाथों का केन्द्रीयकरण व एकाधिकार बनकर वी.आई.पी.बाजार बन कर रह गया।
प्रशासन इस बात का अध्ययन तो करें कि,बाग प्रिंट का एक आदिवासी कलाकार,अपने ग्राम आगर से यह व्यवसाय कर,इन पुश्तैनी रंगरेजों से मुकाबला करतें हुएँ,अन्धेरी गलियों मे रहनें को क्यों मजबूर है।शासन–प्रशासन उसें भी कही सड़क किनारे शासकीय जमीन क्यों नही उपलब्ध करवाई जा रही है।क्या यहा शासन–प्रशासन की बेईमानी नजर नही आती है।
हाल ही मे बाग प्रिंट को लेकर इसे, यहा हब का रुप देने को,व्यवसाय को रोजगार से जोड़ने का, कलेक्टर व कुक्षी के यूवा उत्साही, आय.ए.एस. एस.डी.एम. का उत्साह चरम पर है,उनका यह पवित्र पुण्यों से ओतप्रोत लक्ष्य वास्तव मे स्वागत योग्य कदम है।उनकी कल्पनाओं के अनुरूप यह बाग प्रिंट का कामन फैसिलिटी के अन्तर्गत यह उघोग के रुप मे,अनूसूचित जाति–जनजाति को जोड़ने के उद्देश्यों मे,विकसित व  सफल होता है तो,बाग के लिये यह एक शानदार उपलब्धि होगी।
परन्तु यहा इसके लिए,शासन–प्रशासन को फुँक फुँक कर कदम रखना होगा।क्योंकि इस सेण्टर को बनाने के लिये जो लोग सक्रिय है,वे बाग के ही तीन-चार परिवार के जत्थाबंद व्यवसायिक,पुश्तैनी व्यवसाई है,जो सिर्फ़ इस व्यवसाय को अपने मकड़जाल से बाहर नही होने देने वाले तत्व ही कहलाने योग्य कहा जा सकता है।।
ज्ञातव्यत रहे कि 1985 मे भी तत्कालीन कलेक्टर व एस.डी.एम. ने भी इस व्यवसाय को रोजगार की द्दष्टिकोण से,बाग-टाण्डा रोड़ पर, जिस सरकारी जमीन पर 50 × 50 के पट्टे देकर क्षेत्र के रंगरेंज कलाकारों को जोड़ने के प्रयास का प्रयोग कर, सरकारी जमीन को बाग प्रिंट के लिए अधिग्रहित की गई थी,उस सम्पूर्ण शासकीय भूमि पर एक ही रंगरेंज परिवार ने वृक्षारोपण के नाम काबिज होकर,प्रशासन–शासन के रोजगार से जोडने के सपनें को धुलधसरित कर,बाग प्रिंट का एकाधिकार बनायें रखा।
अब भी वर्तमान 2020 के कलेक्टर व आय.ए.एस. एस.डी.एम के इन पवित्र उद्देश्यों पर कुठाराघात न हों,इसके लिये रणनीति बनाना होगी, और यह मापदण्ड तय करना होगा कि,जो भी रंगरेज इस फैसिलिटी सेंटर पर अपना सेंटर बनाने की उत्सुकता रखता है,उसे पूर्व मे काबिज  शासकीय जमीन से अपना अतिक्रमण हटाना होगा।तभी इस सेंण्टर का उद्देश्य सफल होगा, और बाग प्रिंट का विकेंद्रीकरण व व्यापार मे प्रतिस्पर्धा व क्वालिटी आयेगी।साथ ही अनूसूचित जाति व जनजाति के कलाकारों को इससे जोड़ने का उद्देश्य पूरा होगा।

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