गौ-कैबिनेट में उलझी सरकार, अतिथि विद्वानों की मांग दरकिनार

गौ-कैबिनेट में उलझी सरकार, अतिथि विद्वानों की मांग दरकिनार
भोपाल/राजकमल पांडे। चाहे भाजपा की सरकार हो या कांग्रेस की सरकार बडे-बडे कसमें वादे करके सरकार तो बन लेते हैं। लेकिन जब उन वादों को पूरा करने की बात आती है, तब सरकारें अपने सभी वादों को स्वयं खारिज करते हुए नए राग और मुददे जनता को पकडा देते हैं। अभी हालही के 2019 लोकसभा चुनाव के पूर्व कमलनाथ सरकार ने अतिथि शिक्षकों और रोजगार सहायकों को लेकर एक फैसला लिया था। जिसका लाभ प्रदेश के पौने दो लाख कर्मचारियों को मिलने वाला था, और इसके मंत्री मंडल का गठन भी किया गया था। जिसमें सामान्य प्रशासन मंत्री डाॅं. गोविद सिंह की अध्यक्षता वाली समिति करने वाली थी। और हर तीन माह में सरकार को रिपोर्ट करने के निर्देष थे।
◆यह भी हैं नियमितीकरण से वंचित
म.प्र. में संविदा कर्मियों की संख्या लगभग एक लाख के आस-पास है। जिसमें स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा मिशन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, वन विभाग सहित अन्य महकमों में पदस्थ सभी पंचायतों में रोजगार सहायक नियुक्त हैं।
◆गौ-कैबिनेट के लिए बजट, नियमितीकरण पर वित्तीय भार का डर
भाजपा हो या कांग्रेस इन सरकारों को खजाने की खराब माली हालत पर नजर रहती तो है, पर गौ-कैबिनेट जैसे बजट स्वीकृत हो जाते हैं। तब अतिथि विद्वानों के नियमितीकरण न होना इन सरकारों को सवालो के कटघरों में खडा कर देती है। सरकारें अतिथि विद्वानों के नियमितीकरण पर जिस तरह आंख, कान बंद कर बैठी हैं। तब अतिथि विद्वानों का सड़क में उतर कर प्रदर्शन करना लाजमी है, क्योंकि लम्बे समय से सरकार को सेवा देने के बाद अतिथि विद्वान सरकार पर आश्रित हो गए हैं। जिसके चलते अतिथि विद्वान सरकार के विरूद्व लामबंद हैैं।
◆लोकसभा-विधानसभा चुनाव में होते हैं वादे
भाजपा-कांग्रेस अपने वचनपत्र पर अतिथि विद्वानों के नियमितीकरण का मुद्दा उठाकर यह कहती है कि हम इन्हें नियमित करें पर जब नियमितीकरण का समय और वचनपत्र को पूरा करने समय आता है। तब सरकारें हमारे वित्तीय बजट पर भार आएगा कहके अतिथि विद्वानों को सड़क में भटकनें के लिए छोड देती है। वर्ग विशेष वोटरों को साधने के पुरजोर कोशिश कर सरकार बना लेते हैं, और किसान व युवाओं को साधकर अतिथि विद्वानों की मांग खारिज कर देते हैं।
इन्हें और इतना होगा लाभ
अतिथि शिक्षक 12-15: वेतन 25-30 हजार
◆बारंबार क्यों उठती है नियमितीकरण की मांग
अतिथि विद्वानों की नियमितीकरण पर हर सरकार अपने आपको सशक्त बताकर मुद्दे साधने में सफल हो जाते हैं। व सरकार बनाने-गिराने के पूर्व नियमितीकरण विधानसभा में उछलते रहते हैं। 75 हजार अतिथि विद्वानों सरकार को सेवा देकर दरकिनार होने की कगार पर आ गए हैं। बारंबार नियमितीकरण मांग उठने से यह ज्ञात होता है कि हजारों की तदाद में सेवा देने वाले अतिथि विद्वान गौ-कैबिनेट जैसे बजट से कम महत्वपूर्ण है।
◆यह पूरा मामला
पक्ष-प्रतिपक्ष के नेताओं और सरकारों में जो बडबोलापन है उसी का खामियाजा अतिथि विद्वान भर रहे हैं। अतिथि विद्वानों की दुर्दशा का प्रमुख कारण सरकारों का वित्तीय बजट भार का बहाना है। प्राप्त जानकारी के अनुसार फालेन आउट अतिथि विद्वानों की सेवा में वापसी पर सवाल खड़े हो चुके हैं। 57 (क्र 328) जहां तत्कालीन शिक्षा मंत्री से यह सवाल थे कि उच्च शिक्षा विभाग द्वारा फालेन आउट अतिथि विद्वानों को सेवा में लेने हेतु च्वाईस फिलिंग करवाई गई थी। फिर अतिथि विद्वान के आमंत्रण-पत्र जारी न हो सका। तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने अतिथि विद्वानों के नियमितीकरण वाले मामले को प्रक्रिया प्रचलन में है कहके बात को टाल दिया। म.प्र. उच्च शिक्षा विभाग के आदेश क्रमांक एफ-1-42/2017/38-1 अतिथि विद्वानों के आमंत्रण-पत्र जारी अधर में हैं। नीति और दिशा/निर्देश की कार्रवाई भी अब तक पूर्ण न हो सकी है।




