Amazon Prime Video पर आई नई वेब सीरीज "पंचायत" का रिव्यु कर रहे हैं "द लोकनीति" के संपादक आदित्य सिंह

- अमेजॉन प्राइम वीडियो (Amzon Prime Video) पर आई नई वेबसीरीज “पंचायत” का रिव्यू कर रहे हैं ” द लोकनीति के सम्पादक आदित्य सिंह।
पंचायत टीवीएफ ने बनाया और प्राइम दिखा रहा है।
जिस तरीके से हम जेंडर इक्वालिटी और फियूडल सिस्टम से लड़ने चले हैं या सालों से लड़ रहे हैं उस तरीके या व्यवस्था को सिरे से नकारती यह सीरीज निर्देशन के दृष्टिकोण से ज़बर्दस्त है। हसाते – गुदगुदाते यह सीरीज अंत में आपके आँखों के सामने गणतंत्र दिवस का तिरंगा रख कर कुछ सोचने को मजबूर करती है, इस दौरान आप भावुक भी होते हैं, गला भर जाता है और एहसास होता है कि ग्रामीण विकास के बारे में हमारी गंभीरता दरसल समाज के तौर पर खुद से बोला गया एक बहुत बड़ा झूठ है। घिसी – पिटी सामंती सोच और संकुचित मानसिकता से बाहर निकलने के नाम पर किए गए तमाम सरकारी प्रयासों और दावों पर चोट करती इस कहानी का पटाक्षेप गणतंत्र दिवस पर हो रहा है, यानी सिंबोलिकली हमारे मुह पर जोरदार कंटाप लगाते हुए यह कहानी अंत में समाज के तौर पर हमसे पूछ रही है “कैसा गणतंत्र और कैसी आजादी?”
कहानी –
8 एपिसोड के इस सीरीज का कुल डियूरेशन 4 घंटे 2 मिनट का है, कहानी अभिषेक नाम के एक ग्रैजुएट नौजवान की है जो कैट क्लियर करना चाहता है लेकिन बेरोजगारी के इस दौर में मिली ग्राम पंचायत सचिव की नौकरी छोड़ना उसके लिये बहुत मुश्किल है। तमाम हाँ – ना, असमंजसों और सुझावों के बीच उसे जॉइन करने के लिये मेट्रो सिटी से निकलकर ग्राम पंचायत फुलेरा जनपद बलिया उत्तरप्रदेश आना होता है। जहां उसकी मुलाकात प्रधानपति, उप प्रधान – प्रहलाद, और सहायक सचिव- विकास से होती है। नौकरी को सिर्फ रोजगार के लिये ही जीना है और साथ – साथ कैट की तैयरी करनी है इस सपने के साथ अभिषेक सचिव के तौर पर जब काम शुरू करता है तब उसकी मुलाकात उस वातावरण से होती है जिसे गांव कहते हैं। यह मुलाकात उसे बहुत परेशान, हताश, निराश औऱ इरीटेट करती है। पढ़ाई हो नहीं पाती ऊपर से गांव की तमाम समस्यायों के अलावा प्रधानपति, उप प्रधान और सहायक सचिव समेत समूचे गांव वालों का व्यवहार उसे बहुत अजीब लगता है। तमाम जद्दोजहद के बावजूद गांव का वातावरण उसके लिए एक दिन भी सहज नहीं हो सका। क्योंकि वह सबकुछ मजबूरी में कर रहा था, जिम्मेदारी और रूचि दोनों नहीं थी। इसलिये उसे यह नहीं दिखा कि इस न्यू इंडिया में महिला प्रधान होने के बाद भी प्रधान की हैसियत नहीं रखती, उसे यह नहीं दिखा कि पूरा काम – धाम उसका पति यानि प्रधानपति कर रहा है, उस महिला का कोई वजूद नहीं है जो ऑफिशियल प्रधान है। उसने जनसंख्या नियंत्रण पर लिखे गये नारों पर ग्रामीणों के आपत्ति के बाद उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की। और इसी बहाने टीवीएफ हमारी मुलाकात उस सड़ी – गली वयवस्था से करवाता है जिसके दम पर ग्रामीण भारत की तस्वीर बदली जा रही है। कहानी अपने में ग्रामीण भारत की अशिक्षा, जनसंख्या पर ग्रामीणों की समझ, दहेज के प्रति सहजता और पुरुष प्रधान समाज के अलावा हर उस पहलू को समेटे हुए है जिसके लिए सरकार न तो गंभीर थी और न ही है।
लेकिन याद रहे कि इसे टीवीएफ ने गढ़ा और बुना है इसलिये यह कहानी जिन घटनाओं के बदौलत रची गई है वो आपको निरंतर हँसाती रहेंगी। प्राधानिन मंजू देवी प्रसंग में जहां – जहां आयेंगी वहां आपको निश्चित ही अपने दादी की याद आयेगी। कहानी कई मौकों पर आपको भावुक करती है और हजारों मौकों पर ठहाके भी लगवाती है। भरपूर गंवई पंच, हाव – भाव और वातावरण आपको आपके गांव ले जायेगा। आपको भी अपने गांव का भूत वाला राष्ट्रीय किस्सा जरूर याद आयेगा जिसने गांव में कई फक्कड़ियों को दौड़ाया होगा लेकिन पहले किसे दौड़ाया यह कोई नहीं पता कर सकता।
निर्देशन –
जब आपके आँखों के सामने कुछ विजुअल चल रहा हो और आपका दिमाग निरंतर आपको उससे जोड़ रहा हो, जब आप खुद को उसमें देख पा रहे हों तो इस क्रिया – प्रतिक्रिया के लिये कला के दुनिया में एक शब्द है “जीवंत”। ग्रामीण भारत को, सिंपल शाॉट्स और सिंपल एडिटिंग से आपके सामने जीवंत कर देने वाला निर्देशन है। टीम टीवीएफ के काम और उनकी क्रिएटिविटी में “रियलिस्टिक” वाला एलीमेंट दिखता है। निर्देशन इतना उम्दा है कि एक सेकेंड के लिए आपको कुछ एक्स्ट्रा सिनेमैटिक नहीं लगेगा। हालाकि भारतीय पर्दे पर यह एलिमेंट अपवाद स्वरूप मिलता है।
अभिनय –
आपको कोटा फैक्ट्री याद है? उस सीरीज में जीतेन्द्र कुमार के अभिनय की तारीफ जमकर की गई थी। यकीन मानिए यहां भी जीतेन्द्र ने धांसू अभिनय किया है। जीतेंद्र कुमार ग्राम पंचायत सचिव अभिषेक त्रिपाठी की भूमिका में उस कैरेक्टर की बारीकियों से इतने घुले – मिले हैं कि एक मिनट के लिये आपको यह एहसास नहीं होगा कि लड़का ऐक्टिंग कर रहा है “एफर्टलेस“। प्रधानिन मंजू देवी की भूमिका में नीना गुप्ता और प्रधान-पति के भूमिका में रघुवीर यादव के अभिनय को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। सहायक सचिव यानि विकास के भूमिका में चंदन रॉय छा गये, बहुत सारे पंच और गवंई मासूमियत के बेजोड़ मिश्रण से युक्त इस भूमिका में चंदन रॉय उम्मीद से कहीं ज़्यादा प्रभावित कर रहे हैं। बाकी टीवीएफ की कास्टिंग है आप ही देख लीजिये, लॉकडाऊन में कुछ काम का काम करना है तो यह एक बेहतर काम होगा।
बाकी जाते – जाते दो शब्द ” हाइली रिक्मेंडेड” और “100% पैसा वसूल” बाकी आपकी श्रद्धा।


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