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पदोन्नति में आरक्षण नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला

आरक्षण एक ऐसा मुद्दा बन गया है जिस पर चर्चा होते ही देश का राजनीतिक गलियारा सतर्क हो जाता है। बयान देने से पहले हर नेता कई बार सोचता है। शुक्रवार को देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने एक फैसले में कहा है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा करना किसी का भी मौलिक अधिकार नहीं है।  शीर्ष अदालत ने आगे कहा है कि कोई भी अदालत किसी राज्य सरकार को एससी/एसटी समुदाय को आरक्षण देने का आदेश नहीं दे सकती है। 

अदालत ने कहा है कि यह राज्य सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि वह आरक्षण दे या नहीं या प्रमोशन में आरक्षण दे या नहीं। इसके अलावा राज्य सरकारों पर इस बात की कोई बाध्यता नहीं है कि उन्हें ऐसा करना ही होगा। राज्य सरकारें सरकारी नौकरियों में एससी और एसटी समुदाय के आरक्षण के प्रतिनिधित्व के बारे में डेटा जुटाने के लिये बाध्य हैं। 

बता दें कि उत्तराखंड सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता (सिविल) के पदों पर एससी और एसटी समुदाय को आरक्षण में प्रमोशन से संबंधित मामलों की सुनवाई के फैसले में जस्टिस एल। नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की बेंच ने शुक्रवार को कहा कि, ‘राज्य सरकार आरक्षण देने के लिये बाध्य नहीं है। ऐसा कोई मौलिक अधिकार नहीं है जिसके तहत कोई व्यक्ति प्रमोशन में आरक्षण का दावा कर सके। अदालत किसी भी राज्य सरकार को आरक्षण देने का आदेश नहीं दे सकती है।’ अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को सरकारी नौकरियों में नियुक्ति में आरक्षण देने का निर्देश नहीं दिया जा सकता है। 

एससी और एसटी समुदाय को सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व देने के संबंध में सही आंकड़े जुटाने के संबंध में शीर्ष अदालत ने कहा कि आरक्षण देने से पहले इन आंकड़ों को जुटाना ज़रूरी होगा और अगर राज्य सरकारों ने आरक्षण नहीं देने का फ़ैसला किया है तब इसकी ज़रूरत नहीं होगी।

इस मामले में उत्तराखंड की राज्य सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फ़ैसला किया था जबकि उच्च न्यायालय ने राज्य में एससी और एसटी समुदाय को प्रतिनिधित्व देने से पहले आंकड़े जुटाने का निर्देश दिया था। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि भविष्य में सहायक अभियंता के पदों पर आने वाली नौकरियों में केवल एससी और एसटी समुदाय के ही लोग होने चाहिए। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के इन निर्देशों को न्यायसंगत नहीं बताया और उन्हें दरकिनार कर दिया।

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