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विशेष रिपोर्ट :- भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर उनके बारे में विस्तृत जानकारी

भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस

पुण्यतिथि विशेष : मनीष आमले

बिरसा मुंडा.. 1875 से 1900  ऐसे केवल पच्चीस वर्ष की आयु। इतनी कम आयु में युवा बिरसा लाखों वनवासी बंधुओं का भगवान बन गया। 15 नवंबर 1875 को आज के झारखंड प्रांत के उलीहातू गांव में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ। प्रखर बुद्धिमत्ता के कारण उसको जर्मन मिशन स्कूल में भर्ती किया गया। इसके लिए विरसा का पूरा परिवार ईसाई बन गया। लेकिन जर्मन मिशन ने चर्च के लिए मुंडा गांव की जमीन की मांग की जिस पर कुछ मुंडा लोगों ने आक्षेप लिया। इससे क्रुद्ध होकर फादर नोट्रोट ने मुंडाओं के बारे में अपशब्द कहे। जिससे 14 वर्ष का बिरसा क्रुद्ध हुआ और उसने कड़ा जवाब उस फादर को दिया, परिणाम स्वरूप उसको जर्मन मिशन स्कूल से निकाल दिया गया।
स्कूल से निकालने के बाद बिरसा ने अपने समाज का चिंतन कर अशिक्षा, गरीबी,अज्ञानता से अपने समाज को बाहर निकालने का निश्चय किया। इसी दरम्यान पांड नाम के एक व्यक्ति के पास उसने रामायण महाभारत जैसे ग्रंथों का अध्ययन किया। मुंडा लोगों को संगठित करने का काम उसने शुरू किया। मुंडा जनजातियों का जबरदस्त समर्थन बिरसा को मिलने लगा। मुंडाओं का स्वाभिमान जागृत होने लगा। लोगों ने जमींदारों के सामने झुकने से इनकार कर दिया,चर्च में जाना छोड़ कर मुंडा लोग विरसा के साथ भजन, कीर्तन करने लगे। इससे तत्कालीन अंग्रेज अंग्रेज सरकार घबरा गई और उसने बिरसा को कैद कर लिया। लेकिन 2 साल की शिक्षा के बाद बिरसा जब जेल से बाहर आया तो हजारों लोग उसके स्वागत के लिए उपस्थित थे। फिर बिरसा ने बिरसाईयत नामसे आध्यात्मिक संगठन प्रारंभ किया। लोग उसे भगवान मानने लगे। एक प्रभावी संगठन बनाने के बाद वनवासियों को लूटने वाले जमीनदार, अंग्रेज और ईसाई मिशनरी यह हमारे सबसे बड़े दुश्मन है ऐसा विचार रखकर बिरसा ने तत्कालीन छोटा नागपुर क्षेत्र में अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष प्रारंभ किया। अपनी इस लड़ाई को उसने उलगुलान का नाम दिया। मुंडा लोगों के प्रतिकार से अंग्रेज सरकार कांप गई। उन्होंने किसी भी हाल में बिरसा को पकड़ने का निश्चय किया। डोंबरी पहाड़ पर हजारों मुंडा लोग एकत्रित आने वाले हैं, इस बात का पता चलते ही अंग्रेजों ने उस पर धावा बोल दिया। अंधाधुंध गोलियां चलाई गई, जिसमें हजारों मुंडा लोग वीरगति प्राप्त हो गए। 
इस भयानक नरसंहार के बाद भी बिरसा का कार्य चलता ही गया। उसको ज्यादा दिन बाहर रखना खतरनाक हो सकता है, यह सोचकर अंग्रेजों ने बिरसा को पकड़ने के लिए ₹500 का इनाम घोषित किया। फिर भी उसका परिणाम नहीं हुआ। एक दिन बिरसा को पकड़ने में अंग्रेज सरकार कामयाब हुई। उसको रांची के जेल में रखा गया। आखिर 9 जून 1900 को बिरसा की रांची के जेल में ही मृत्यु हो गई। एशियाटिक हैजा होने के कारण उसकी मृत्यु हुई ऐसा अंग्रेज सरकार द्वारा घोषित किया गया,लेकिन उस पर विष प्रयोग कर उसको मार दिया ऐसा भी कहा जाता है। 
25 वर्ष की अल्पायु में बिरसा ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी प्राणों का बलिदान किया। बिरसा केवल जनजाति समाज का ही नहीं तो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण योद्धा माना जाता है। 
9 जून यह भगवान बिरसा मुंडा का बलिदान दिवस।
भारत माता के इस महान क्रांतिकारी सपूत को शत शत नमन।

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