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सिवनी :- मजदूरों ने उपसरपंच और रोजगार सहायक पर लगाए मनमानी के आरोप, इतने कम पैसे में करा रहे हैं काम

सुनिये सरकार, मनरेगा मजदूरों की मेहनत का मजाक उड़ा रही है धपारा पंचायत

मजदूरों ने उपसरपंच और रोजगार सहायक पर लगाए मनमानी के आरोप

तंगहाल मजदूरों को 50 – 80 रुपये दैनिक मजदूरी में रख रहे मनरेगा के काम में

18 साल से कम उम्र के बच्चों से करा रहे मजदूरी

फर्जी हाजिरी से भ्रष्टाचार की सम्भावना

सिवनी से महेंद्र सिंघ नायक की रिपोर्ट :- वर्तमान परिस्थिति में श्रमिकों को रोजगार देकर उनकी आजीविका चलाने में सहयोग के लिये सरकार ने लॉकडाउन होते हुये भी मनरेगा के दरवाजे खोल दिये हैं! लेकिन पंचायत के कर्ताधर्ता अपनी मनमानी और स्वार्थलिप्सा से इस मजदूरहितैषी योजना का स्वरूप विद्रूपित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.यूँ तो पहले भी मनरेगा में हुये काम संदिग्ध ही रहे हैं. कभी फर्जी मजदूर, तो कभी मशीनों के उपयोग ने मनरेगा जैसी महात्वाकांक्षी योजना के लाभ से वास्तविक मजदूर को वंचित रखा है! हालांकि जिले में पलायनवाद के कारण अधिकांश मजदूर अन्यत्र काम करके आजीविका चलाते हैं, परन्तु अब जब कोरोना महामारी के कारण सभी मजदूर स्थानीय रोजगार पर निर्भर हैं; ऐसे में भी मनरेगा में अतिअल्प मजदूरी पर दिन भर कड़ी धूप में काम करना मजदूरों पर दोहरी मार है! शासन द्वारा अनुमानित मजदूरी दर से लगभग तीन गुना कम पर उनसे दिनभर काम लेना मजदूर का गम्भीर शोषण है.

     ऐसा ही मामला जनपद पंचायत लखनादौन की ग्राम पंचायत धपारा में देखने को मिला है! जहाँ पर मनरेगा अन्तर्गत चल रहे नाला गहराई के काम में व्यापक गड़बड़ी के साथ मजदूरों का शोषण सामने आ रहा है! मोहंगाँव और धपारा के बीच से गुजरने वाले नाले में जारी गहरीकरण के लिये मजदूरों के साथ में 18 वर्ष से कम उम्र के स्कूली लड़के-लड़कियों को काम पर रखा गया है! इसके साथ शासन द्वारा निर्धारित अनुमानित मजदूरी दर 202 रुपये दैनिक के स्थान पर बिना मूल्यांकन किये बिना ही, अनुमानित 50 रुपये से लेकर 80 रुपये दैनिक मजदूरी कहकर ही मनरेगा का रोजगार दिया जा रहा है! भीषण त्रासदी में इतनी कम मजदूरी दर से काम रहे मजदूर आक्रोशित हैं.

काम कर रहे मजदूरों का आरोप है कि उपसरपंच रामदयाल यादव एवं रोजगार सहायक अन्नीलाल यहके द्वारा खुले शब्दों में 50 से 80 रुपये औसत दैनिक मजदूरी कहकर काम पर रखा गया है! इससे अधिक मजदूरी की मांग रखने वालों को काम से निकालने की धौंस देने की बात भी मजदूरों द्वारा कही जा रही है! इसके अलावा वास्तविक मजदूर संख्या के साथ फर्जी लोगों की हाजिरी भरकर शासन की राहतमूलक राशि का दुरुपयोग करने के आरोप भी मजदूरों द्वारा लगाये जा रहे हैं!
   इस महामारी के कारण जब निम्न आय वाला मजदूर वर्ग गम्भीर आर्थिक संकट को झेल रहा है; ऐसे में उनसे पूरा दिन कड़ी धूप में काम कराके भी महज 80 रुपये देना सीधा-सीधा गरीब का शोषण है! जबकि शासन द्वारा 202 रुपये दैनिक निर्धारित है! हाँ मूल्यांकन में कुछ अन्तर आ सकता है, लेकिन लगभग तीन गुना कम बिना मूल्यांकन के घोषित करना सीधे पंचायत के उपसरपंच और रोजगार सहायक की मनमानी का द्योतक है! फर्जी हाजिरी के विषय पर तो ऐसा लगता है, मजदूरों का पेट काटकर उनके हित की राशि चहेतों को उपकृत करने में व्यय की जानी है! बावजूद इसके नाबालिग स्कूली बच्चों को काम पर रखना तो वैसे भी अनैतिक तथा नियमविरुद्ध है! 
      शासन प्रशासन को इस ओर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है! मजदूरों को राहत देने के स्थान पर उनकी शोषण करना अनैतिक है, अमानवीय है! भारत की बुनियाद यही गरीब मजदूर हैं, इन्हें आज शासन के सहयोग की आवश्यकता भी अपने परिश्रम के बदले चाहिये! ये कृपा नहीं, अपनी मेहनत का उचित मूल्य मांगते हैं!

इनका कहना है:-

नितेन्द्र यादव (मनरेगा मजदूर)

” यहाँ बहुत गड़बड़ है उपसरपंच ने 50 से 80 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से काम पर रखा है, कहते हैं कि इंजीनियर साहब इतनी मजदूरी बताई है! अभी तो काम चल ही रहा है, कैसे मूल्यांकन हो गया! इतनी कम मजदूरी में हम क्या कर पायेंगे.

महेन्द्र लड़िया (एपीओ, मनरेगा जनपद पंचायत लखनादौन)

“जाँच के बाद ही कुछ कह पायेंगे.”

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