क्या हरियाणा और महाराष्ट्र के विस चुनाव के नतीजों ने कब्र में जाते मुद्दों को आवाज़ दे दी है?

क्या हरियाणा और महाराष्ट्र के विस चुनाव के नतीजों ने कब्र में जाते मुद्दों को आवाज़ दे दी है?

आपको याद होगा कि कैसे 2019 के आम चुनाव में असल मुद्दों को स्टेज से आहुति दी जा रही थी. हरेक रैली में ये ध्यान रखा जा रहा था कि गलती से भी मूल मुद्दों का ज़िक्र न हो जाए. इलेक्शन जुमलेक्शन में तब्दील हो गया था. और फिर जब चुनाव के नतीजे आए तो लगा कि अब इस देश से मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, किसान, विकास जैसे मुद्दों को सरकार ने कब्र की ओर धकेल दिया है और राजनीति का नया ट्रेंड स्थापित कर दिया है. मगर जिस तरह से हाल ही में हुए महाराष्ट्र और हरियाणा विस चुनाव के नतीजे आए है उसने इस बात को खोखला साबित कर दिया है. यहाँ हम 17वी लोकसभा के चुनाव और महाराष्ट्र और हरियाणा विस चुनाव दोनों को लेकर बात करेंगे.

2019 के आम चुनाव की रैलियों में सत्तारूढ़ पार्टी ने बदज़ुबानी के मामले में सभी पार्टीयों को पीछे छोड़ दिया था. हालात ऐसे थे कि लोगों को टी.एन शेषन याद आने लगे थे. विपक्षी पार्टी के दिवंगत नेता पर पाँचवे और छठवें चरण में खूब हमले बोले गए. भाजपा के नेताओं ने कब्र से राजीव गाँधी और हेमंत करकरे को चुनावी पिच पर लाकर असल मुद्दों को कब्र की ओर धकेल दिया. 'तू चोर तेरा बाप चोर' का एपिसोड कई दिनों तक चला था.

चौकीदार चोर है का नारा बुलंद करने वाले राहुल गाँधी को शायद पता भी नहीं होगा कि 1960 में कांग्रेस ने ही आदर्श आचार संहिता को अमली जामा पहनाया था. जिसमें समय के हिसाब से आमूल चूल परिवर्तन होते रहते है. हमें 2019 का आम चुनाव एकता कपूर का कोई सीरियल लगने लगा था. चुनाव रैलियों से काम की बातें गायब कर दी गई थी. भाजपा यही प्रयोग हरियाणा और महाराष्ट्र में भी दोहराना चाहती थी. मगर इन चुनाव के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा ने अपने हलक में पाकिस्तान और राष्ट्रवाद इन दो शब्दों का जो बीमा करवाया था उसकी वैधता अब समाप्त होने को है.

महाराष्ट्र में भाजपा को सीटों के लिहाज से सबसे बड़ा नुकसान विदर्भ में हुआ है. जल संकट से जूझ रहे विदर्भ के लोग त्रस्त थे. किसान परेशान थे. मतदान केंद्र जैसी लाइने वहाँ पानी के लिए लग रही थी. चुनाव में फडणवीस सरकार के पाँच मंत्री - पंकजा मुंडे,राम शिंदे,विजय शिवतारे,बाला भेगड़े और अर्जुन खोतकर भी चुनाव हार गए. वहीं हरियाणा में चुनाव हारने वाले मंत्रियों की संख्या 7 है.

नेताओं द्वारा 370,बालाकोट,पाकिस्तान का राग दोनों राज्यों में अलपाया गया था लेकिन जनता कमर कस चुकी थी. और स्थानीय मुद्दों को लेकर ही उसने मतदान किया. महाराष्ट्र में 34 हज़ार करोड़ की कर्ज माफी की योजना का लाभ किसानों तक नही पहुँच पाया और किसान लगातार आत्महत्या करते रहे. युवाओं को रोजगार नहीं मिला. विकास योजनाओं का हल्ला-गुल्ला सरकार बनने के साल भर बाद ही थम गया था. वहीं हरियाणा ऐसा राज्य है जहाँ बेरोजगारी की दर पूरे भारत मे सबसे ज्यादा है. मंदी के कारण गुरुग्राम की फ़ैक्टरियों से लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. जाट आंदोलन में हुई हिंसा ने कानून व्यवस्था की पोल खोल दी थी. वही महाराष्ट्र के लातूर में तो कांग्रेस के धीरज देशमुख के बाद सबसे ज्यादा वोट नोटा को पड़े. महाराष्ट्र और हरियाणा की सभाओं में अबकी बार 200 पार और 75 पार के नारे लगाए जा रहे थे. लेकिन ईवीएम में पड़े मतों ने बहुमत के सपने का छीछालेदर कर दिया. सतारा में मर रहे किसानों को लेकर बीजेपी ने कोई बात नहीं छेड़ी. नाराज़ जनता ने भी अपने फैसले से बता दिया कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती. महाराष्ट्र में तो जनता ने ईवीएम का ऐसा बटन दबाया है कि सत्ता वापसी के लिए भाजपा को रोज़ गुणा भाग करनी पड़ रही है. इस जनमत ने साफ कर दिया कि आज भी सत्ता की कुर्सी का रास्ता असली मुद्दों से होकर जाता है.