मप्र की "प्रतिभा" सड़कों पर फल-सब्जी बेचने को मजबूर, गोंड कलाकर दो वक्त के भोजन के लिए परेशान, आइए मिलकर बने गोंड कलाकारों की आवाज

मप्र की “प्रतिभा” सड़कों पर फल-सब्जी बेचने को मजबूर, गोंड कलाकर दो वक्त के भोजन के लिए परेशान
भोपाल:- मध्य प्रदेश को प्रतिभा का राज्य कहा जाता है. प्राचीन काल से मध्य प्रदेश नई-नई कलाकृतियां पेंटिंग इत्यादि के लिए मशहूर रहा. मध्य प्रदेश के कलाकार विश्व विख्यात है.
पर इसी मध्यप्रदेश में गोंड कलाकार दो वक्त की रोटी जुटाने में परेशानियों का सामना लगातार करते हैं. उनके हाथ में सिर्फ कलाकारी के लिए ब्रश नहीं बल्कि उन्हें मजदूरी भी करनी पड़ रही है.
एक निजी डिजिटल मीडिया Gaon Comnection ने इस मुद्दे को बेहद प्रमुखता से उठाया.
दिन का अधिकांश समय अपने ठेले पर सब्जी बेचने के बाद, थके हुए संतोष श्याम घर में दाखिल हुए। उनका दिन भोर से पहले शुरू हुआ जब उन्होंने एक ऑटोरिक्शा किराए पर लिया, और आस-पास के गांवों और मंडी में सब्जियां लेने के लिए गए, सब्जियों को उन्होंने अपने ठेले पर व्यवस्थित किया और उन्हें भोपाल की गलियों में बेचने के लिए निकल पड़े। ऐसा संतोष श्याम हर रोज करते हैं. क्योंकि उन्हें परिवार का भरण पोषण करना है.
45 वर्षीय श्याम अपने परिवार का पेट भरने के लिए हर रोज भोपाल की गलियों में सब्जी बेचा करते हैं. श्याम बड़ी प्रतिभा के धनी है.

कुछ महीने पहले तक, महामारी की दूसरी लहर से पहले, उन्हें एक गोंड कलाकार के रूप में जाना जाता था। उनकी कई पेंटिंग देश-विदेश के संग्रहालयों और कला पारखी लोगों की दीवारों पर टंगी हैं। उन्हें अपने काम का डेमो देने के लिए आमंत्रित किया गया था और उनके चित्रों ने कई कला प्रदर्शनियों में भाग लिया है।
पर उन्हें अपनी पत्नी और दो बेटियों का पेट भरने के लिए सब्जियां बेचनी पड़ती है.
चर्चा में एक ऐसे कलाकार नहीं है जो इस तरह से परेशानियों का सामना कर रहे हैं.
इनके अलावा मध्यप्रदेश में कई कलाकार हर रोज दो वक्त की रोटी जुटाने में असमर्थ है. दूसरी तरफ गोंड आर्टिस्ट सुनील टेकाम और उनकी पत्नी मनरेगा में काम करते हैं.

लेकिन, महामारी ने गोंड कला के संरक्षकों को छीन लिया है, इन आदिवासी कलाकारों के पास दिहाड़ी, सब्जी विक्रेता या मैनुअल मजदूर के रूप में काम करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
यह बताते हैं कि अगर हम बहुत ज्यादा थक के नहीं होते हैं तो 1 दिन में एक पेंटिंग जरूर बनाते हैं.
इस बीच, गोंड कलाकारों के मेहनती हाथ, जो आम तौर पर कला के आश्चर्यजनक टुकड़े बनाते हैं.वे इस महामारी में परेशान हैं.
Gaon Connection की पोस्ट से साभार


क्या है गोंड कलाकृतियां :-
मध्यप्रदेश के मण्डल जिले की प्रसिद्ध जनजातियों में से एक 'गोंड' द्वारा बानायी गयी चित्र कला की विशिष्ट कलाशैली को गोंड चित्रकला के नाम से जाना जाता है। लम्बाई और चौड़ाई केवल इन दो आयामों वाली ये कलाकृतियाँ खुले हाथ बनायी जाती हैं जो इनका जीवन दर्शन प्रदर्शित करती हैं। गहराई, जो किसी भी चित्र का तीसरा आयाम मानी गयी है, हर लोककला शैली की तरह इसमें भी सदा लुप्त रहती है जो लोक कलाओं के कलाकारों की सादगी और सरलता की परिचायक है।
गोंड कलाकृतियाँ इस जनजाति के स्वभाव और रहन सहन की खुली किताब हैं। इनसे गोंड प्रजाति के रहन सहन और स्वभाव का अच्छा परिचय मिलता है। कभी तो ये कलाकृतियाँ यह बताती हैं कि कलाकारों की कल्पना कितनी रंगीन हो सकती है और कभी यह कि प्रकृति के सबसे फीके चित्रों को भी ये अपने रंगों से कितना जीवंत बना सकते हैं।
उदाहरण के लिये वे छिपकली या ऐसे ही अकलात्मक समझे जाने वाले जंतुओं को तीखे रंगों से रंग कर चित्रकला के सुंदर नमूनों में परिवर्तित कर देते हैं। यदि हम इसका दार्शनिक पक्ष देखें तो यह उनकी प्रकृति को भी रंग देने की उत्कट भावना को प्रदर्शित करता है।
उनके द्वारा बनाए गए चित्रों के आकार शायद ही कभी एक रंग के होते हैं । कभी उनमें धारियाँ डाली जाती हैं कभी उन्हें छोटी छोटी बिन्दियों से सजाया जाता है और कभी उन्हें किसी अन्य ज्यामितीय नमूने से भरा जाता है। ये कलाकृतियाँ हस्त निर्मित कागज़ पर पोस्टर रंगों से बनाई जाती हैं। चित्रों की विषयवस्तु प्राकृतिक प्रतिवेश से या उनके दैनिक जीवन की घटनाओं से ली जाती है। फसल, खेत या परिवारिक समारोह लगभग सभी कुछ उनके चित्रफलक पर अपना सौन्दर्य बिखेरता है।
आइए मिलकर बने गोंड कलाकारों की आवाज :-
इतनी कलाकृतियों के धनी इन गोंड कलाकारों को इन दिनों भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. कला होते हुए भी इन्हें पेट पालने के लिए ना तो कला को प्रदर्शित करने का ढंग से मौका मिल रहा है और ना ही इन्हें वह ओहदा जो एक धरोहर को जिंदा रखने वाले को मिलनी चाहिए.
आइए हम सब मिलकर इन गोंड कलाकारों की आवाज बने. ताकि इस महामारी के दौरान जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन समस्याओं से बाहर निकल सकें.
इस खूबसूरत कलाकृति को बचाने के लिए इन्हें प्रोत्साहित करें. मदद का हाथ बढ़ाएं. और उनका उत्साहवर्धन करें और वह प्लेटफॉर्म दिलाने की कोशिश करें जिसके लिए इनके पेंटब्रश बने हुए हैं.
यह धरोहर मिटने ना पाए, पेंट के कलर सूखने ना पाए. आइए मिलकर हाथ बढ़ाएं


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