दमोह : हत्या का प्रकरण अंतरित करने पर न्यायालय की रोक, हत्याकांड मामले में विधायक रामबाई को एक और झटका

हत्या का प्रकरण अंतरित करने पर न्यायालय की रोक,
-पीठासीन अधिकारी पर आरोप लगाने वाले दोनों आवेदन निरस्त
-देवेंद्र चौरसिया हत्याकांड मामले में विधायक रामबाई को एक और झटका
दमोह से शंकर दुबे की रिपोर्ट : – जिले के कद्दावर नेता देवेंद्र चौरसिया हत्याकांड मामले में अभियुक्तों द्वारा पीठासीन अधिकारी पर आरोप लगाने वाले दो अलग-अलग आवेदनों को जिला एवं सत्र न्यायालय ने निराधार पाते हुए निरस्त कर दिया है। मालूम हो कि इस हत्याकांड में पथरिया से बसपा की एकमात्र महिला विधायक रामबाई सिंह परिहार के पति, उनके देवर तथा भतीजे सहित 20 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था। न्यायालय का यह आदेश विधायक के लिए एक और झटका माना जा रहा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायालय के सत्र प्रकरण क्रमांक 30/2019 में पीठासीन अधिकारी आरपी सोनकर पर पक्षपात करने का आरोप लगाने वाले दोनों आवेदनों को निरस्त कर दिया गया है। गौरतलब है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के समक्ष बसपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले कद्दावर नेता देवेंद्र चौरसिया की हटा स्थित उन्हीं के गिट्टी क्रेशर प्लांट पर 15 मार्च 2019 को हत्या कर दी गई थी। मामले में पुलिस ने पीड़ित परिजनों एवं मृतक के पुत्र सोमेश चौरसिया के मृत्युकालिक कथन के आधार पर पथरिया विधायक रामबाई परिहार के पति गोविंद सिंह, देवर कौशलेंद्र उर्फ चंदू सिंह, भतीजे गोलू ठाकुर, जिला पंचायत अध्यक्ष शिवचरण पटेल के पुत्र इंद्रपाल पटेल सहित 20 लोगों पर हत्या का मामला दर्ज किया था। इसी मामले को लेकर अभियुक्त चंदू उर्फ कौशलेंद्र पुत्र रब्बी सिंह, संदीप पुत्र समुद्र तोमर, आकाश पुत्र आजाद परिहार, भानसिंह पुत्र अरवल परिहार की तरफ से एक आवेदन जिला एवं सत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। जिसमें उन्होंने पीठासीन अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 409 के तहत मामला अन्य न्यायालय में अंतरित किए जाने का निवेदन किया था। इसी प्रकरण में एक अन्य आवेदन गोलू उर्फ दीपेंद्र पुत्र वीरेंद्र परिहार तथा बलवीर पुत्र बहादुर ठाकुर ने भी जिला सत्र न्यायालय में देकर पीठासीन अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए थे।
यह थी आरोप : –
दोनों ही आवेदन में पीठासीन अधिकारी पर आरोप लगाए गए कि वह कार्यवाई को प्रभावित करते हैं तथा अभियोजन पक्ष के साक्षी महेश चौरसिया के कथनों में जो बातें समर्थन नहीं करती उनका भी समर्थन करते हैं और उन्हें सिखाते हैं। एक अन्य आरोप में कहा गया कि 26 नवंबर 2020 को अभियोजन पक्ष के चार-पांच अधिवक्ताओं को सुनवाई के दौरान न्यायालय कक्ष में प्रवेश दिया गया, जबकि बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं को बाहर कर दिया गया। इसी तरह यह भी आरोप लगाया गया कि 10 नवंबर 2020 को पीठासीन अधिकारी ने अभियोजन पक्ष के महेश चौरसिया से कहा कि डरो मत मैं हूं। मामले के आरोपी कौशलेंद्र परिहार की गलत पहचान, इंद्रपाल पटेल की गवाही के दौरान नेट कनेक्टिविटी खराब होने की बात कहकर प्रत्यक्ष गवाही कराना तथा न्यायालय में अभियोजन पक्ष के अधिवक्ताओं को इशारे करने के आरोप शामिल हैं। दूसरे आवेदन में आरोप लगाए गए हैं कि गोलू उर्फ दीपेंद्र परिहार की जमानत याचिका हाईकोर्ट में स्वीकार होने तथा उसके समर्पण की सूचना के बाद भी गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया गया। इसी तरह अभियुक्त बलवीर ठाकुर की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद भी उसे अस्पताल से वापस जेल भेज दिया गया तथा जेल प्रबंधक एवं मेडिकल ऑफिसर को शासकीय कार्य में बाधा डालने का दोषी मानते हुए प्रकरण पंजीबद्ध किया गया। जबकि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया। एक अन्य आरोप में कहा गया है कि गोलू उर्फ दीपेंद्र के पक्ष में 2 लाख 50 हज़ार की जमानत अर्जी पेश किए जाने के बाद भी जमानत निरस्त कर गई। इसी तरह के कई अन्य आरोप भी पीठासीन अधिकारी पर लगाए गए हैं।
आरोपों को निराधार माना : –
जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनुराधा शुक्ला ने दोनों मामलों की अलग-अलग सुनवाई करते हुए पीठासीन अधिकारी पर लगाए गए आरोपों, प्रस्तुत साक्ष्य एवं कार्यवाई का अवलोकन कर आरोप निराधार पाते हुए आवेदन निरस्त कर दिए। आदेश में कहा गया है कि यदि नेट कनेक्टिविटी में कोई गड़बड़ी है तो इसके लिए पीठासीन अधिकारी दोषी नहीं है। गोलू उर्फ दीपेंद्र की जमानत सक्षम नहीं थी। जमानत पत्र के लिए कागज पेश किए गए थे वह पूर्व से ही बैंक में बंधक थे। दूसरे जमानतदार की भूमि असिंचित थी। दीपेंद्र सिंह अन्य प्रकरण में न्यायालय में समर्पण कर चुका था, इस प्रकरण में नहीं। इसी प्रकार बलवीर सिंह की कोरोना आरटीपीसीआर टेस्ट रिपोर्ट की छाया प्रति न्यायालय में पेश की गई, उसमें किसी के हस्ताक्षर नहीं थे। अतः उस रिपोर्ट पर विश्वास नहीं किया जा सकता। इस संबंध में पीठासीन अधिकारी ने सीएमएचओ को रिकॉर्ड सहित पेश होने का आदेश दिया था। अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ताओं को न्यायालय कक्ष में प्रवेश न देने के संदर्भ में आदेश में कहा है कि अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता दोपहर पश्चात न्यायालय में पहुंचे थे। जबकि अभियोजन पक्ष के साक्षी सुबह से ही न्यायालय में उपस्थित थे। अतः यह आदेश पीठासीन अधिकारी द्वारा इसलिए पारित किया गया की भविष्य में साक्ष्य लेखन की कार्रवाई समय पर शुरू हो सके। विदुषी न्यायाधीश ने अनावेदक क्रमांक दो महेश चौरसिया को दोनों मामलों में परिव्यय राशि 2-2 हज़ार रुपए देने का आदेश भी पारित किया है। अभियोजन पक्ष की ओर से जिला लोक अभियोजक बीएम शर्मा एवं अधिवक्ता मनीष नगायच ने पैरवी की।


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