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अहमदाबाद में "झुग्गियों" के सामने दीवार चुनावने वाली घटना को "RSS" की विचारधारा से जोड़ कर देख रहे हैं "द लोकनीति" के संपादक आदित्य सिंह

Proletariat and Bourgeois! (कम्युनिस्टों से विशेष सवाल) 

मुझे लगता है कि ये कहना हल्का है कि भारत की गरीबी को ट्रम्प से छिपाने के लिये ऐसा किया जा रहा है, हर चीज को ऐसे ही सतही ढंग से देखा जाना फिर भूल जाना ” concrete condition concrete analysis” वाले बेहद जरूरी सिद्घांत से मुह मोड़ना होगा।

कभी आपने गौर से देश के गृहमंत्री को बोलते हुए सुना है? एक शब्द आता है “Ideology”। मैं जब सुनता हूं तो अचानक से ठहर जाता हूँ, फिर गौर से उस आदमी के बॉडीलैंग्वेज में कन्विक्शन देखता हूं, जो दिखता भी है। जब गृहमंत्री देश के किसी भी मुद्दे पर बोलते हुए संविधान, न्याय और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों का कम-से-कम इस्तेमाल करके अपनी बात को ideologically सही करने लगते हैं तो वहां पर कन्विक्शन दिखाई देता है। फ़िर मैं उन तमाम निष्कर्षों को खारिज करने की स्थिति में होता हूँ, जिसमें लोग कहते हैं कि बीजेपी या मोदी – शाह यही सब करके सत्ता में बने रहना चाहते हैं। मुझे लगता है कि वे सभी लोग जो ऐसा कहते हैं concrete analysis नहीं करते। बात सत्ता में बने रहने भर की नहीं है ब्लकि उसके साथ – साथ विचारधारा को धारतल पर मजबूत करने की कोशिश की भी है। CAA /NRC, यूनीफॉर्म सिविल कोड, धारा 370 ये सबकुछ एक तरीका है भारत को  व्यवहारिक दृष्टिकोण से हिन्दू राष्ट्र के इर्द-गिर्द धकेलने का। नई शिक्षा नीति लाकर गरीबों को शिक्षा से वंचित करना इसी साज़िश का हिस्सा है, सवर्ण का बच्चा शिक्षा, व्यापार और प्रशासन चलायेगा बाकी के और लोग वही करेंगे जो इस देश के हजारों साल के इतिहास में करते आए हैं। यही मनुस्मृति है और यही है आरएसएस का हिन्दू राष्ट्र। अब इसको मौजूदा परिपेक्ष्य में समझने का प्रयास करिये कि यही वो लोग हैं जो अमीर हैं, यही वो लोग हैं जो आगे भी अमीर रहेंगे, यानी पूंजी की ही चलेगी और यही है पूंजीवाद। और यही हार्डकोरे दक्षिणपंथ है। 

ठीक इसी तरह से भारत की गरीबी को छिपाने का जो एक नया विमर्श खड़ा किया जा रहा है, वह गलत है। कल को ट्रम्प उसी रास्ते से गुजरते हुए अगर प्रधानमंत्री से यह बात पूछ बैठें कि दीवाल के उस पार क्या है, तो जवाब में प्रधानमंत्री ये बात कह सकते हैं कि वहां स्लम आबादी है और ये बात ट्रम्प को ठीक भी लगेगी। क्योंकि दक्षिणपंथीयों को यह सही लगता है कि मैला ढोने वाले, झाड़ू लगाने वाले, नाले में उतर कर मैनुअल स्कैवेंजिंग करने वाले आदि लोगों को साफ – सुथरी सिविलाइज्ड सोसाइटी से दूर रखना चाहिए। दुनिया में भारत की गरीबी या दुनिया में किसी भी देश की गरीबी दूसरे किसी देश से छुपी थोड़ी रह सकती है। यहां तक कि भुखमरी का बाकायदा ग्लोबल इंडेक्स भी बनता है, जिसमें भारत बहुत अच्छा कर रहा है, और वही संस्था बनाती है जिसमें यूएस का दबदबा है। तो यह सब ट्रम्प से छिपाने के लिये नहीं ब्लकि यह उन्हें कम्फर्ट फ़ील कराने की कवायद है।

पूरी दुनिया में कट्टर दक्षिणपंथीयों का आज जलवा है, एक दूसरे का साथ देते रहो जिससे कि ग्लोबल प्लैटफॉर्म पर मानवाधिकार की कोई बड़ी बहस न खड़ी हो और अपने – अपने देश में अल्ट्रा नैशनलिज्म, एंटी इस्लामिक मॉडल और तमाम तरह की कंजरवेटिव विचारधाराओं को धरातल पर उतारते रहो। बीजेपी ने देश के मौजूदा सामाजिक संरचना को अपने हिसाब से दुरुस्त कर लिया है, उसे पता है कि जितना मुसलामानों से नफरत की जायेगी, जितना संविधान को खोखला किया जायेगा और जितना गांधी के नाम का दिखावा करके गांधी को डिमीन किया जायेगा उतना ही देश का एक विशेष समाज खुश होगा, उन्हें पता है कि वह समाज आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से वर्चस्व में है, अगर वो साथ है तो सबका साथ भी है और सबका विश्वास भी है। उसे मौका दिख रहा है विनायक दामोदर सावरकर, बळीराम हेडगेवार और माधवराव सदाशिव गोलवलकर की सोच को आरएसएस के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में हिन्दुस्तान पर थोप देने का।

इसलिये विमर्श को बड़ा करना पड़ेगा देश की 80 फ़ीसदी आबदी के लिये ये घटना किसी वैंपायर की आहट से कम नहीं हो सकती, इसे गरीबी छुपाने तक ही सीमित रखना दक्षिणपंथीयों को वाकओवर देने जैसा है। बाकी तस्वीर देखिये और आर्टिकल का पहला अंग्रेज़ी वाला वाक्य याद कीजिए और मुस्कराते हुए मार्क्स के प्रासंगिकता पर गौर कीजिये। 
आदित्य सिंह 

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