दिल्ली: देश में कोई भी आंदोलन, कोई भी धरना-प्रदर्शन वह किस दिशा में जाए यह हमारे भारत देश का मीडिया हाउस तय करता है ?

दिल्ली: देश में कोई भी आंदोलन, कोई भी धरना-प्रदर्शन वह किस दिशा में जाए यह हमारे भारत देश का मीडिया हाउस तय करता है ?
द लोकनीति डेस्क
दिल्ली/राजकमल पांडे। यह एक बार की बात नहीं है, देष में जब भी किसी मांग को लेकर किसान, जनता, छात्र-छात्राएं, षिक्षक आदि धरना, प्रदर्शन, चक्का जाम, आंदोलन करते हैं. तब हमारे भारत देश की खूबसूरत मीडिया हाऊस अपने स्टूडियों में बैठ कर यह तय करते हैं कि लोगों की मांग और धरना, प्रदर्शन आंदोलन को कौन सी दिशा देनी है। यह दावे के साथ नहीं कह सकते की देश की पूरी मीडिया हाउस बिका हुआ है, बल्कि उसी मीडिया हाउस की भीड में बहुत से पत्रकारों ने पत्रकारिता को जीवित भी रखा हुआ है। केन्द्र के खूंटे से बंधा हमारे देश की पत्रकारिता कितना लिजलिजा है यह देखना हो तो टीवी, चैनलों में गुर्राने वाले एंकर और पत्रकारों को देखा जा सकता है कि वह किस कदर किसान आंदोलन पर केन्द्र सरकार के कान भर रहे हैं। जनजीवन की आवाज बुलन्द करना ही पत्रकारिता है अपितु इनदिनों पत्रकारिता में ऐसी परिभाषाओं के कोई मोल बचे नहीं हैं।
सबसे मजेदार बात तो यह है कि जिस नए कृषि कानून के बिल को वापस लेने हेतु दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के किसान दिल्ली घेरने में लगे थे, उस वक्त हमारे देश का मीडिया हाउस किसान बिल देशहित में है कि खबरे चला रहा था। केन्द्रीय मंत्री से लेकर कृषि मंत्री, रक्षा मंत्री के ट्विट को बेक्रिंग में चला रहे थे, खैर यह हमारे देश का मीडिया है यह न कभी सुधरा है और न सुधरेगा। आज तो ट्विटर पे उन पत्रकारों को यूजर्स ने घेरा जो किसान विरोधी खबरे दिखा रहे थे, किसानों के विरोध में बोल रहे थे। और अब पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री व अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल ने भी राष्ट्रपति को चिटठी लिख कर पद्म विभूषण वापस कर यह स्पष्ट कर दिया है कि इस नए किसान बिल से किसानों का हक तो मारा जा रहा है। प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति को जो चिटठी लिखी है. उस पूरे पत्र में इस नए बिल का विरोध ही किया है। पहले केन्द्र सरकार में मंत्री रही हरसिमरत ने इस्तीफा दिया और अब पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पद्म विभूषण वापस कर सरकार को चेताया है। अकाली दल किसान के इस नए बिल पर शुरूआती दिनों से ही विरोध पर थी.
देश के बडे-बडे जानकार, अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवि तबका यही कह रहे हैं कि इस नए कृषि बिल से देश के किसानों को नुकसान हो, जिसकी पूरी रिपोर्ट (द लोकनीति के वेसाइड पर जाकर देखी जा सकती है) बस दो ही हैं ऐसे हैं एक केन्द्र सरकार और दूसरा देश का मीडिया हाउस जो यह बता रहे हैं कि इस नए बिल से किसानों का भला होगा। अजब-गजब के अर्थशास्त्री केन्द्र सरकार के खूंटे में बंध पडे हैं। खैर किसानो का आंदोलन एक निर्णायक मोड पड है और न आंदोलनकर्ता और न नेतृत्वकर्ता किसी भी कीमत में घुटने टेकने को तैयार नहीं है. और यह बात किसानों के मोर्चे से बारम्बार आ चुके हैं।




