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फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ दायर याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की ख़ारिज, याचिकाकर्ता पर लगाया 50 हजार का जुर्माना 

नई दिल्ली –  बुधवार को जम्मू कश्मीर के नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ कार्रवाई किये जाने के अनुरोध वाली एक जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि 'सरकार की राय से अलग और असहमति वाली राय रखने वाले विचारों की अभिव्यक्ति को देशद्रोह नहीं कहा जा सकता। 

इतना ही नहीं इस जनहित याचिका दाखिल करने वाले याचिकाकर्ता पर सुप्रीम कोर्ट ने 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया हैं। कोर्ट ने ये जुर्माना याचिकाकर्ता की इस दलील को साबित ना कर पाने पर लगाया कि फारूक अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 पर भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान की मदद मांगी थी। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चार सप्ताह के भीतर इस धनराशि को सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता कल्याण कोष में जमा कराने का निर्देश दिया हैं। 

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की एक पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि  'केन्द्र सरकार द्वारा लिये गये एक निर्णय पर असहमति वाले विचारों की अभिव्यक्ति को राजद्रोह नहीं कहा जा सकता हैं। बयान में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो हमें इतना आपत्तिजनक लगे कि एक अदालत द्वारा कार्यवाही शुरू करने के लिए कार्रवाई का कारण दिया जाए। 

फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ दाखिल की गई थी याचिका 

मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के मामले को लेकर रजत शर्मा नाम के एक शख्स ने याचिका दाखिल की थी और जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खिलाफ बयान देने पर फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ देशद्रोह की कार्यवाही करने के आदेश देने की मांग की थी। 

याचिका में कहा गया था , 'फारूक अब्दुल्ला ने भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के तहत एक दंडनीय अपराध किया हैं। जैसा कि उन्होंने बयान दिया है कि अनुच्छेद 370 को बहाल कराने के लिए वह चीन की मदद लेंगे जो स्पष्ट रूप से राजद्रोह का कृत्य है और इसलिए उन्हें आईपीसी की धारा 124-ए के तहत दंडित किया जाना चाहिए। 

याचिकाकर्ता ने कहा था कि 'फारूक अब्दुल्ला ने ये बयान दिया था कि वो 370 को फिर से लागू कर देंगे जो कि देशविरोधी है और देशद्रोह के समान है क्योंकि यह संसद ने बहुमत से पास किसा था। याचिकाकर्ता के मुताबिक, 'फारूक अब्दुल्ला ने लाइव बयान दिया कि अनुच्छेद 370 को बहाल करने के लिए वह चीन की मदद लेंगे जो स्पष्ट रूप से देशद्रोह हैं। चूंकि अब्दुल्ला कश्मीर को चीन और पाकिस्तान को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए संसद से उनकी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए और जेल भेजा जाना चाहिए। 

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