आजाद भारत में रानी लक्ष्मी बाई और गुलाम भारत में महारानी लक्ष्मी बाई और महिलाओं का महिला सशक्तिकरण 

आजाद भारत में रानी लक्ष्मी बाई और गुलाम भारत में महारानी लक्ष्मी बाई और महिलाओं का महिला सशक्तिकरण 

आजाद भारत में रानी लक्ष्मी बाई और गुलाम भारत में महारानी लक्ष्मी बाई और महिलाओं का महिला सशक्तिकरण 

 

  • महिलाओं ने दिखाया कि वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषो से कम नहीं 
  • महिला सशक्तिकरण के नाम पर बहुत बार किया जाता है दुरूपयोग 
  • समाज में आज भी महिलाओं को नहीं मिल रहा बराबरी का स्थान 
  • धार्मिक रूढ़िवादी दुनिया में अभी भी लोगों में महिला-पुरुष के प्रति रूढ़िवादी सोच कायम है। 
  • इसके कारण आज भी महिला या पुरुष में बहुत सारी असमानताएं देखी जाती है।

विशेष -शशांक तिवारी की रिपोर्ट 
द लोकनीति डेस्क भोपाल 

 

वीरांगना नाम सुनते ही हमारे मनोमस्तिष्क में रानी लक्ष्मीबाई की छवि उभरने लगती है। भारतीय वसुंधरा को अपने वीरोचित भाव से गौरवान्वित करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई सच्चे अर्थों में वीरांगना ही थीं। वे भारतीय महिलाओं के समक्ष अपने जीवन काल में ही ऐसा आदर्श स्थापित करके विदा हुईं, जिससे हर कोई प्रेरणा ले सकता है। कहा जाता है कि सच्चे वीर को कोई भी प्रलोभन अपने कर्तव्य से विमुख नहीं कर सकता। ऐसा ही रानी लक्ष्मीबाई का जीवन था। उसके मन में अपने राज्य और राष्ट्र से एकात्म स्थापित करने वाली भक्ति हमेशा विद्यमान रही। वीरांगना के मन में हमेशा यह बात कचोटती रही कि देश के दुश्मन अंग्रेजों को सबक सिखाया जाए। इसी कारण उन्होंने यह घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। इतिहास बताता है कि इस घोषणा के बाद रानी ने अंग्रेजों से युद्ध किया।


वीरांगना लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति किस कदर घृणा थी, वह इस बात से पता चल जाता है कि जब रानी का अंतिम समय आया, तब ग्वालियर की भूमि पर स्थित गंगादास की बड़ी शाला में रानी ने संतों से कहा कि कुछ ऐसा करो कि मेरा शरीर अंग्रेज न छू पाएं। इसके बाद रानी स्वर्ग सिधार गईं और बड़ी शाला में स्थित एक झोंपड़ी को चिता का रुप देकर रानी का अंतिम संस्कार कर दिया और अंग्रेज देखते ही रह गए। हालांकि इससे पूर्व रानी के समर्थन में बड़ी शाला के संतों ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, जिसमें 745 संतों का बलिदान भी हुआ, पूरी तरह सैनिकों की भांति अंग्रेजों से युद्ध करने वाले संतों ने रानी के शरीर की मरते दम तक रक्षा की।

जिन महापुरुषों का मन वीरोचित भाव से भरा होता है, उसका लक्ष्य सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय उत्थान ही होता है। वह एक ऐसे आदर्श चरित्र को जीता है, जो समाज के लिए प्रेरणा बनता है। इसके साथ ही वह अपने पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सदैव आत्मविश्वासी, कर्तव्य परायण, स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ होता है। ऐसी ही थीं महारानी लक्ष्मीबाई। उनका जन्म काशी में 19 नवंबर 1835 को हुआ। इनके पिता मोरोपंत ताम्बे चिकनाजी अप्पा के आश्रित थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई था। महारानी के पितामह बलवंत राव के बाजीराव पेशवा की सेना में सेनानायक होने के कारण मोरोपंत पर भी पेशवा की कृपा रहने लगी। लक्ष्मीबाई अपने बाल्यकाल में मनु व मणिकर्णिका के नाम से जानी जाती थीं।


सन् 1850 मात्र 15 वर्ष की आयु में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से मणिकर्णिका का विवाह हुआ। एक वर्ष बाद ही उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। लेकिन चार माह पश्चात ही उस बालक का निधन हो गया। राजा गंगाधर राव को तो इतना गहरा धक्का पहुंचा कि वे फिर स्वस्थ न हो सके और 21 नवंबर 1853 को चल बसे। यद्यपि महाराजा का निधन महारानी के लिए असहनीय था, लेकिन फिर भी वे घबराई नहीं, उन्होंने विवेक नहीं खोया। राजा गंगाधर राव ने अपने जीवनकाल में ही अपने परिवार के बालक दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानकर अंग्रेज सरकार को सूचना दे दी थी। परंतु ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने दत्तक पुत्र को अस्वीकार कर दिया।

27 फरवरी 1854 को लार्ड डलहौजी ने गोद की नीति के अंतर्गत दत्तक पुत्र दामोदर राव की गोद अस्वीकृत कर दी और झांसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी। यह सूचना पाते ही रानी के मुख से यह वाक्य प्रस्फुटित हो गया, मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी। यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ।

समाज में आज भी महिलाओं को नहीं मिल रहा बराबरी का स्थान 
भले ही महिला सशक्तिकरण के नाम पर राज्य और केन्द्रो की सरकारे ने करोड़ो फूंख डाले हो लेकिन समाज की सोच में इसका असर उतना नहीं दिख रहा जितना हमें दिखाया जाता है। महिलाओ के साथ लगातार हादसे ,चैन स्नैचिंग ,बलात्कार ,ईव टीसिंग।,मनचलो द्वारा सताया जाना ,सब सामान्य ही तो है ,कुछ इज्जत बचाकर पुलिस तक नहीं पहुँच पाते ,कुछ हर बात पर यही टंटा इस्तेमाल कर लेते है। स्पेशल रेडकोड पुलिस बनाई है कॉलेज की लड़कियों की सहायता के लिए। ..... क्योंकि वे रानी लक्ष्मी बाई तो है नहीं कि घोड़ा दौड़ाने लगे  ..हालांकि कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में घरेलू हिंसा का एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमे एक पति अपनी पत्नी को बुरी तरह पीट रहा था। हैरानी की बात ये थी कि वह मध्यप्रदेश के पुलिस विभाग के स्टेट रैंक आला दर्जे का अधिकारी था। नाम लेना में उचित नहीं समझता  क्योंकि ये किसी के घर का मामला है। .... लेकिन बात सोचनी वाली यह है कि एक पढ़ा लिखा आला अधिकारी में जब यह सोच नहीं आती और समाज में इतने जल्द कैसे आ सकती है ?? बात केवल मध्यप्रदेश के DIG पुलिस विभाग की बस नहीं है। जो नेता खुद मंच से महिला सशक्तिकरण की भारी बाते डुबाकर डुबाकर मारते है। लेकिन अपने घर की बहन बेटियों की कितनी इज्जत और कितना सशक्त करते है यह भी किसी से छिप नहीं सकता। हाल ही बिहार चुनाव में बीजेपी और NDA की सरकार बनी और उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे ज्यादा धन्यवाद "साइलेंट वोटर्स"(silent voter ) का किया यहाँ पहली बार किसी ने महिलाओं को साइलेंट कहा।  हालाँकि मोहल्ले की महिलाओं की बातें सुन ले तो आप साइलेंट से वायलेंट भी हो सकते है। क्योंकि ये अपने आप में सोसाइटी के cctv कैमरा से कम नहीं है। 


धार्मिक रूढ़िवादी दुनिया में अभी भी लोगों में महिला-पुरुष के प्रति रूढ़िवादी सोच कायम है। 

जब लड़का -लड़की जन्म लेता है तभी से उसमें फ़र्क करना शुरू हो जाता है। आज भी देश में गर्भपात(abortion ) भ्रूण हत्या(foeticide) जैसा अपराध होते आ  रहे है। आप सोच रहे होंगे ये सब अनपढ़ -ग्वार ,और छोटे लोगो का यह काम है लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है यह बकायदा पढ़े लिखे और सभ्य समाज के लोगों का ही खेल और अपराध है। ग़रीब तो गरीब उसे ज्यादा नहीं मालुम। . उसे बस इतना समझ आता है कि ऊपर वाला भूखा उठाता है लेकिन भूखा नहीं सुलाता  .... 

women empowerment के बहाने fake feminism का चलता ढोंग क्या ऐसे बनेगी लक्ष्मीबाई 


वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई ने अंग्रेजो से जबरदस्त लोहा लेते हुए ग्वालियर से खदेड़ा। . उन्होंने अपना फेमिनिज्म भी बचाया और मातृ शक्ति का भी बेहतरीन मिशाल पेश की लेकिन आज के मौजूदा हालत में तरह तरह की घटनाये देखने मिलती है। जिसमे कुछ तो निजी स्वार्थो के लिए किसी भी व्यक्ति के भविष्य के साथ खिलवाड़  है। वाक़ई इसमे समाज के लिए अलग नकरात्मक दृश्य दिखाई देता है। ....