कुछ तो गड़बड़ है !

कुछ तो गड़बड़ है !

कुछ तो गड़बड़ है !

अमित दुबे:-अधिकांश हम  देखते है ही की किसी भी आयोग का गठन लोगो के हित ओर उनको होने बाली परेशानियों को देखते हुए किया जाता है ताकि उनकी समस्याओं और शिकायतों का निर्धारित समय सीमा में समाधान हो सके और उन्ही आयोगों की कार्यप्रणाली पर विश्वास करके लोग अपनी शिकायते उन आयोगों के पास लेकर जाते है ! पर क्या यथार्थ में उनकी समस्याओं और शिकायतों का समाधान हो पाता है ? ये अपने आप मे एक बड़ा प्रश्न है ?क्योंकि देखने मे आया है कि इन आयोगों में एक बहुत बड़ा प्रशासनिक अमला जिसकी नियोक्ति राज्य या केंद्र सरकार द्वारा अपने हित को सोच कर की जाती है जिससे वे अपने निजि स्वार्थ को किसी के दबाब के चलते पूरा  कर पाते है और लोगो को अपनी शिकायतों पर कार्यबाही के नाम पर मात्र ब्यक्ति विशेष जो कि या तो किसी विभाग का बड़ा प्रशासनिक अधिकारी होता है या किसी चुनी हुई सरकार का मंत्री या बिधायक होता है जिसकी शिकायत इन आयोगों में कई जाती है उसको बचाने का प्रयास कुछ एक भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारी अपने निजी स्वार्थ के चलते करते हैं इन आयोगों में  जानबूझकर पेंडेंसी बढ़ाई जाती है जिससे आयोग की कार्यप्रणाली पर दबाव बढ़ता चला जाता है और शिकायतों का निराकरण निर्धारित समय सीमा में ना होकर सालो लग जाते हैं  जिसका फायदा ज्यादातर उन भ्रष्ट अधिकारियों को होता है जिनके द्वारा व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार किया गया होता है जब आयोग के समक्ष इसके संबंध में कोई शिकायत की जाती है शिकायत का समाधान एक लंबी प्रक्रिया के तहत कई वर्षों में होता है शिकायतकर्ता अनेकों मानसिक और शारीरिक व आर्थिकपरेशानी से ग्रसित होकर इन आयोगों के चक्कर लगा लगा कर थक जाता है और जब कभी शिकायतों पर कार्रवाई की बात होती है तो आयोग द्वारा शिकायतकर्ता को कार्रवाई का मात्र आश्वासन दिया जाता है और कार्रवाई के नाम पर अधिकांश धरातल पर कुछ नहीं होता जिससे भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारियों और नेताओ के हौसले बुलंद होते रहते हैं  और वह निरंतर भ्रष्टाचार करते हैं ऐसा ही मामला  मेरे संज्ञान में आया है आवेदक अबेदन की जानकारी को लेने के लिए संबंधित विभाग में जाता है जब वहां से जानकारी प्राप्त नहीं होती तो वह उसकी अपील संबंधित अपीलीय अधिकारी को करता है अपीलीय अधिकारी के आदेश के बाद जब जानकारी उपलब्ध नहीं होती तो आवेदक आयोग के दरवाजे पर दस्तक देता 2 साल के लंबे इंतजार के बाद जब सुनवाई का वक्त आता है तो संबंधित शासकीय अधिकारी जिसे निर्धारित समय सीमा में आवेदक को जानकारी उपलब्ध करा देनी चाहिए उससे आयोग द्वारा संपर्क किया जाता है और उस शासकीय अधिकारी से सैकेट्री द्वारा आपसी सामंजस्य बिठाकर  आवेदक को मात्र जानकारी उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया जाता है पर उस शासकीय अधिकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती जिसके द्वारा निर्धारित समय सीमा में जानकारी उपलब्ध कराए जानी थी जिससे कि उक्त जानकारी के आधार पर किए गए कार्यों का यथार्थ में अवलोकन किया जा सके वैसे तो आयोग तक शिकायत पहुंचने या फिर दोषी होने पर दोषी अधिकारी के ऊपर जो निर्धारित समय सीमा में जानकारी उपलब्ध नहीं कराने पर उस पर जुर्माना किया जाता है पर यथार्थ में लाखों केस पेंडिंग हैं हजारों की सुनवाई हो चुकी है हजारों में अधिकारी दोषी पाए गए हैं पर जब जुर्माने की बात आती है तो आप की सांठगांठ के चलते दोषी अधिकारियों पर कोई जुर्माना नहीं किया जाता लोगों को दिखाने के लिए कुछ कर्मचारियों अधिकारियों जुर्माने की औपचारिकता की जाती है ऐसे में आयोगों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजमी क्या इन आयोगों में पदस्थ अधिकारी कर्मचारियों की कार्यप्रणाली की जांच नहीं होनी चाहिए ? क्या  यह नही देखना चाहिए  दोषी अधिकारी बिना किसी करवाने के आयोग की कार्रवाई से कैसे बच कर निकल जाते हैं क्या इन आयोगों के सदस्यों और कर्मचारियों की संपत्ति की संपत्ति की जांच नहीं होनी चाहिए क्या इनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं बनाते क्यों यह अधिकारियों को बचाने का प्रयास करते हैं जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते  क्यों ओर कैसे ये जुर्माने से बचाया जाते है क्या पीड़ित को पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया जाता यह सब सोचने वाले बिंदु है बाकी आप  समझदार हैं क्योंकि आयोग अब दिखावा मात्र है वह रह गए हैं और भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद हैं !